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निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 भाग 21: उपस्थापन क्या होता है (धारा 61)

Shadab Salim
23 Sep 2021 9:39 AM GMT
निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 भाग 21: उपस्थापन क्या होता है (धारा 61)
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परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) के अंतर्गत (धारा 61) उपस्थापन का अर्थ प्रस्तुत करती है। इस अधिनियम के अंतर्गत उपस्थापन के लिए विशेष रुप से एक अध्याय प्रस्तुत किया गया है जिसके अंतर्गत कुल 16 धाराओं में उपस्थापन से संबंधित नियमों को प्रावधानित किया गया है।

अधिनियम की धारा 61 उपस्थापन का अर्थ प्रस्तुत करती है। इस आलेख के अंतर्गत उपस्थापन से संबंधित प्रथम धारा 61 पर विवेचना प्रस्तुत की जा रही है तथा इस धारा के अनुसार दिए गए प्रावधान जो उपस्थापन के अर्थ को स्पष्ट करते हैं पर संक्षिप्त टिप्पणी की जा रही है।

परक्राम्य लिखत अर्थात् वचन पत्र, विनिमय पत्र या चेक एक निश्चित धनराशि को संदाय करने का वचन या आदेश अन्तर्निहित करते हैं। वचन पत्र में वचन एवं विनिमय पत्र या चेक में निश्चित धनराशि भुगतान करने का आदेश होता है।

विनिमय पत्र या चेक में ऊपरवाल को इस आदेश की कोई जानकारी नहीं होनी है। वचन पत्र इसका अपवाद होता है, क्योंकि वचनदाता अर्थात् रचयिता स्वयं इस प्रकार का वचन देता है। अधिनियम में विनिमय पत्र की दशा में प्रतिग्रहण के लिए एवं सभी लिखतों में संदाय के लिए उपस्थापना को अपेक्षा की गई है।

अधिनियम की योजना इस वास्ते धारा 61 से 77 तक है जिसे निम्नलिखित रूप में अध्ययन किया जा सकता है:-

1. उपस्थापन क्या है और इसके कितने प्रकार होते हैं।

2. उपस्थापन के नियम।

3. कब उपस्थापन आवश्यक नहीं।

4. अ-उपस्थापन के परिणाम एवं प्रभाव।

1. उपस्थापन क्या है- अधिनियम लिखतों के उपस्थापन की अपेक्षा करता है। उपस्थापन सामान्य तौर से लिखतों के धारक द्वारा एक माँग होती है जो लिखतों के अधीन करने की अपेक्षा की जाती है। निर्देश या तो विनिमय पत्र में प्रतिग्रहण करने या अन्य सभी लिखतों में संदाय की होती है। अतः लिखत का धारक विनिमय पत्र में प्रतिग्रहण के लिए और सभी लिखतों को संदाय के लिए दायी पक्षकार के समक्ष उपस्थापित की जाती है।

उपस्थापन के प्रकार अधिनियम निम्नलिखित रूप में उपस्थापन का वर्गीकरण करता-

(1) प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापन (धारा 61)

(2) वचन पत्र का दर्शन के लिए उपस्थापन (धारा 62)

(3) संदाय के लिए उपस्थापन (धारा 64)

(4) लेखोवाल को भारित करने के लिए चेक की दशा में (धारा 72/138)

(1) प्रतिग्रहण के लिए विनिमय पत्र का उपस्थापन (धारा 61) अधिनियम की धारा 61 में उपबन्धित है कि–'यदि दर्शनोपरान्त देय विनिमय पत्र में उसके उपस्थापन के लिए कोई समय या स्थान विनिर्दिष्ट नहीं है तो उसे उस व्यक्ति द्वारा जो उसके प्रतिग्रहण की मांग करने का हकदार है, उसके लिखे जाने के बाद युक्तियुक्त समय के अन्दर और कारवार के दिन कारवार के समय में प्रतिग्रहण के लिए उसके ऊपरवाल को यदि वह युक्तियुक्त तलाश के पश्चात् पाया जा सके, उपस्थापित किया जाएगा। ऐसे उपस्थापन में व्यतिक्रम होने पर उसका कोई भी पक्षकार ऐसा व्यतिक्रम करने वाले पक्षकार के प्रति उस पर दायी न होगा।

यदि ऊपरवाल युक्तियुक्त तलाश के पश्चात् न पाया जा सके तो विनिमय पत्र अनादूत हो जाता है। यदि विनिमय पत्र ऊपरवाल को किसी विनिर्दिष्ट स्थान पर निर्दिष्ट है, तो वह उस स्थान पर हो उपस्थापित किया जाना चाहिए और यदि उपस्थापित करने के लिए सम्यक् तारीख को युक्तियुक्त तलाश के पश्चात् यहाँ न पाया जा सके तो विनिमय पत्र अनादृत हो जाता है।

जहाँ कि करार या प्रथा से ऐसा करना प्राधिकृत है, यहाँ रजिस्ट्रीकृत पत्र से डाकघर के माध्यम द्वारा उपस्थापन पर्याप्त है।

प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापन के नियम धाराओं 33, 34, 61, 69, 75 एवं 75क के परिशीलन से निम्नलिखित नियम उद्भूत होते हैं-

(1) किसे उपस्थापित किया जाय और कौन प्रतिग्रहीत करेगा- धारा 33 में उपबन्धित है कि विनिमय पत्र के ऊपरवाल या कई ऊपरवालों में से सब या कुछ या जिकरीवाल या आदरणार्थ प्रतिग्रहीता के रूप में उसमें नामित व्यक्ति के सिवाय कोई भी व्यक्ति प्रतिग्रहण द्वारा अपने को आबद्ध नहीं कर सकता।

इस प्रकार व्यक्ति जो विनिमय पत्र की प्रतिग्रहीत कर सकता है:-

(i) विनिमय पत्र का ऊपरवाल, या

(ii) कई ऊपरवालों में सभी या कुछ या

(iii) व्यक्ति जिसे विनिमय पत्र में जिकरीवाल नामित है, या

(iv) आदरणार्थ प्रतिग्रहीता, या

(v) ऊपरवाल के सम्यक् प्राधिकृत अभिकर्ता, या

(vi) मृत्यु की दशा में उसके विधिक प्रतिनिधि, या

(vii) ऊपरवाल के दिवालिया की दशा में उसके समनुदेशिती

अत: उक्त व्यक्तियों के समक्ष प्रतिग्रहण के लिए विनिमय पत्र का उपस्थापन किया जाएगा। अनेक ऊपरवालों द्वारा प्रतिग्रहण धारा 34 के अधीन जहाँ कि विनिमय पत्र के कोई ऐसे ऊपरवाल है, जो भागीदार नहीं है, यहाँ उनमें से हर एक उसे अपने लिए प्रतिग्रहीत कर सकता है, किन्तु उनमें से कोई भी उसे किसी दूसरे के लिए उसके प्राधिकार के बिना प्रतिग्रहीत नहीं कर सकता।

धारा 86 के अनुसार जहाँ कई ऊपरवाल हैं जो भागीदार नहीं हैं, यहाँ हर ऊपरवाल से विनिमय पत्र का प्रतिग्रहण किया जाना चाहिए। जहाँ उनमें से कुछ द्वारा प्रतिग्रहीत किया जाता है तो ऐसा प्रतिग्रहण विशेषित होगा और विनिमय पत्र अनादृत माना जाएगा।

कई ऊपरवाल जो भागीदार है जहाँ कई ऊपरवाल हैं, जो किसी फर्म के भागीदार हैं, वहाँ किसी एक के द्वारा प्रतिग्रहण अन्य सभी के विरुद्ध माना जाएगा, क्योंकि प्रत्येक भागीदार को अन्य भागोदारों के प्राधिकृत अभिकर्ता होते हैं।

(2) प्रतिग्रहण का स्थान एवं समय- यदि विनिमय पत्र में कोई विशेष समय एवं स्थान निर्देशित है तो प्रतिग्रहण के लिए उसी समय एवं स्थान पर उपस्थापित किया जाना चाहिए और यदि ऊपरवाल उस समय एवं स्थान पर युक्तियुक्त खोज द्वारा नहीं पाया जाता है, तो विनिमय पत्र अनादृत माना जाता है। (धारा 69)

जहाँ कोई विनिमय पत्र के प्रतिग्रहण के लिए कोई स्थान विहित नहीं है तो वहाँ, जहाँ कहाँ भी ऊपरवाल पाया जाता है, उपस्थापन किया जा सकेगा और यदि वह युक्तियुक्त खोज से नहीं पाया जाता है तो विनिमय पत्र अनादूत माना जाएगा। (धारा 71)

(3) डाक द्वारा उपस्थापन- जहाँ अनुबन्ध द्वारा प्राधिकृत है या रुढ़ियों के अनुसार उपस्थापन पोस्ट ऑफिस द्वारा किया जाना है वहाँ पंजीकृत डाक द्वारा पत्र भेजना पर्याप्त होगा।

इंग्लिश विनिमय पत्र अधिनियम, 1882 में इसी प्रकार प्रावधान किया गया है।

(4) युक्तियुक्त समय में जहाँ लिखत में कोई समय विहित नहीं है वहाँ इसे प्रतिग्रहण के लिए युक्तियुक्त समय में उपस्थापित किया जाना चाहिए। धारा 105 में यह उपबन्धित है कि युक्तियुक्त समय के अवधारण में लिखत की प्रकृति एवं प्राधिक व्यवहार को ध्यान में रखा जाएगा। धारा 75क के अधीन विलम्ब को माफी करने का प्रावधान है जहाँ विलम्ब उन परिस्थितियों में किया गया है जो उसके नियंत्रण के बाहर था विनिमय पत्र को सदैव कारोबार के समय एवं कारोबार के दिन उपस्थापित किया जाना चाहिए।

कब प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापन आवश्यक है एक विनिमय पत्र को संदाय के लिए उपस्थापन के पूर्व प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापित किया जाएगा। परन्तु सभी विनिमय पत्रों को प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापित करना आवश्यक नहीं होता है।

प्रतिग्रहण के लिए विनिमय पत्र का उपस्थापन करना निम्नलिखित दशा में आवश्यक होता है जहाँ,

(i) विनिमय पत्र प्रतिग्रहण के पश्चात् निश्चित समय पर देय है, या

(ii) विनिमय पत्र दर्शनोत्तर देय है, या

(iii) जहाँ विनिमय पत्र में प्रतिग्रहण का उपस्थापन अपेक्षित है, या

(iv) जहाँ विनिमय पत्र ऊपरवाल के निवास स्थान या कारोबार स्थान से भिन्न किसी स्थान पर देय बनाया गया है।

प्रतिग्रहण के उपस्थापन का उद्देश्य - एक विनिमय पत्र प्रतिग्रहण वास्ते निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए उपस्थापित की जाती है-

(i) ऊपरवाल को विनिमय पत्र में एक पक्षकार के रूप में आवद्धता को सुनिश्चित करने लिए।

(ii) अप्रतिग्रहण की दशा में विनिमय पत्र के लेखोवाल को आरोपित करने के लिए।

(III) कब प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापन अनावश्यक होता है - इस सम्बन्ध में परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, परन्तु आंग्ल विनिमय पत्र अधिनियम, 1882 में निश्चित प्रावधान धारा 40 (2) में किया गया है, जो है : निम्नलिखित मामलों में विनिमय पत्र का प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापन को माफी दिया गया है, एवं विनिमय पत्र अनादृत माना जाएगा-

(1) जहाँ ऊपरवाल है:-

(i) एक मृतक व्यक्ति।

(ii) दिवालिया न्यायनिर्णत है।

(iii) काल्पनिक व्यक्ति है।

(iv) संविदा करने में असक्षम व्यक्ति है।

(2) जहाँ ऊपरवाल सम्यक् खोज के पश्चात् नहीं पाया जाता है, विनिमय पत्र उक सभी प्रावधानों को भारतीय विधि में भी प्रयोज्य बनाया गया है।

(IV) प्रतिग्रहण के उपस्थापन न करने का परिणाम विनिमय पत्र के पक्षकारों के बीच संविदात्मक सम्बन्ध या विधिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए ऊपरवाल द्वारा विनिमय पत्र का प्रतिग्रहण आवश्यक होता है।

यदि इसे प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापित नहीं किया जाता है, निम्नलिखित परिणाम उत्पन्न होते हैं-

(i) विनिमय पत्र के अधीन ऊपरवाल का दायित्व उत्पन्न नहीं होगा।

(ii) विनिमय पत्र के पक्षकारों के बीच संविदात्मक सम्बन्ध नहीं होगा।

(iii) विनिमय पत्र को अनादृत मान लिया जाएगा।

(IV) ऊपरवाल को विचार-विमर्श के लिए समय- यदि विनिमय पत्र का ऊपरवाल, जो प्रतिग्रहण के लिए उसके समक्ष उपस्थापित किया गया है. धारक से ऐसी अपेक्षा करे तो यह ऊपरवाल को यह विचार करने के लिए क्या वह उसे प्रतिग्रहीत करेगा अड़तालिस घण्टे का समय (लोक अवकाश दिनों का अपवर्जन करके) देगा (धारा 63, परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881)

(2) वचन पत्र को दर्शन के लिए उपस्थापन (धारा 62)

अधिनियम की धारा 62 में यह उपबन्धित है कि दर्शानोपरान्त निश्चित कालावधि पर देय वचन पत्र उसके रचयिता के समक्ष (यदि यह युक्तियुक्त तलाश के पश्चात् पाया जा सके) उसके रचे जाने के पश्चात् युक्तियुक्त समय के अन्दर उस व्यक्ति द्वारा जो संदाय की माँग करने का हकदार है और कारबार के दिन कारवार के समय दर्शन के लिए उपस्थापित किया जाना चाहिए। ऐसे उपस्थापन में व्यतिक्रम होने पर उसका कोई भी पक्षकार ऐसा व्यतिक्रम करने वाले व्यतिक्रम के प्रति उस पर दायी न होगा।

(3) संदाय के लिए उपस्थापन ( धारा 64 ) – धारा 64 में संदाय के लिए लिखतों का उपस्थापन का प्रावधान किया गया है। वचन पत्र, विनिमय पत्र या चेक क्रमशः उसके रचयिता, प्रतिग्रहांता या ऊपरवाल को एतस्मिन्पश्चात् उपबन्धित तौर पर संदाय के लिए धारक द्वारा या उसकी ओर से उपस्थापित किए जाने होंगे। ऐसे उपस्थापन में व्यतिक्रम होने पर उसके अन्य पक्षकार ऐसे धारक के प्रति उस पर दायो न होंगे।

जहाँ करार या प्रथा द्वारा अधिकृत है, पंजीकृत डाक द्वारा पंजीकृत पत्र द्वारा उपस्थापन पर्याप्त होगा।

(4) लेखीवाल को भारित करने के लिए चेक का उपस्थापन (धारा 72, 138)

चेकों का संदाय के लिए उपस्थापन - अन्य लिखतों के समान चेक को भी संदाय के लिए बैंक में उपस्थापन करना होगा। ऐसा उपस्थापन संग्रहण हेतु या नकद संदाय के लिए किया जा सकता है। अब चेकों को कोर बैंकिंग सेवा (सी० बी० सी०) के अधीन ऊपरवाल बैंक के किसी अन्य शाखा पर संदाय हेतु उपस्थापित किया जा सकता है। चेक को संदाय के लिए ऊपरवाल बैंक में उपस्थापना आवश्यक है। चेक का संग्रहण किसी भी बैंक के माध्यम से किया जा सकता है, जहाँ धारक का खाता है।

सन् 1988 में चेकों के इतिहास में एक बहुत ही महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला कि खातों में अपर्याप्त निधियों के कारण कतिपय चेकों के अनादर को अपराध बना दिया गया है जो इस अधिनियम को धारा 138 के अधीन दण्डनीय है और वह व्यक्ति जिसने अपराध किया है, कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो चैक रकम की दुगुना तक हो सके. या दोनों से दण्डनीय होगा। चेकों के अनादर सम्बन्धी नई विधि का उपबन्ध अधिनियम की धारा 138 से 148 तक किया गया है।

परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अधीन अब चेकों के अनादर को अपराध घोषित किया गया है। इसकी प्रथम अपेक्षा है कि चेक को इसके लिखे जाने की तिथि से 6 माह के अन्दर या चेक की विधिमान्यता अवधि जो भी इन दोनों में से पूर्व की हो, बैंक में प्रस्थापित किया जाना चाहिए। इस पहलू को आगे के अध्याय में विस्तार से स्पष्ट किया गया है।

धारा 138 उन निधियों के अभाव में चेक के अनादर को अपराध बनाता है जो दो वर्ष की कारावास और आर्थिक जुर्माना जो चेक की धनराशि का दो गुना होगा या दोनों से दण्डित होगा।

चेकों का निरन्तर उपस्थापन- सदानन्दन भादरन बनाम माधवन सुनील कुमाएँ, के मामले में उच्चतम न्यायालय का यह विनिश्चय था कि एक चेक को उसकी विधिमान्यता अवधि में अनेकों बार उपस्थापित किया जा सकेगा। यहाँ तक कि चेक के अनादर के पश्चात् भी चेक को पुनः संदाय के लिए बैंक में उपस्थापित किया जा सकेगा।

उच्चतम न्यायालय का यह मत था कि चेक को निरन्तर उपस्थापन धारा 138 के अधीन कोई कार्यवाही करने के पूर्व ही की जा सकेगी, परन्तु उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को एम० एस० आर० लेदर बनाम पलानियप्पन के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उलट दिया था और यह निर्णीत किया है कि एक चैक को उसकी विधिमान्यता अवधि में यहाँ तक कि धारा 138 के अधीन माँग सूचना देने के बावजूद भी संदाय के लिए उपस्थापित किया जा सकेगा।

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