Know The Law | मोटर दुर्घटना का क्लेम कहां दायर किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने बताया
Shahadat
26 Sept 2026 2:40 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मोटर दुर्घटना मुआवज़ा क्लेम के मामलों में 'क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र' (टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन) के नियम का दायरा समझाया। कोर्ट ने कहा कि कोई क्लेम करने वाला व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए मोटर एक्सीडेंट्स क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि बीमा कंपनी का वहाँ कोई ऑफ़िस है।
जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने क्लेम करने वाले की अपील खारिज करते हुए यह बात कही। बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें क्लेम याचिका को चेन्नई के ट्रिब्यूनल से चित्तूर (आंध्र प्रदेश) के ट्रिब्यूनल में ट्रांसफर कर दिया गया, क्योंकि दुर्घटना असल में वहीं हुई।
अपीलकर्ता (क्लेम करने वाले) ने MV Act की धारा 166 के तहत MACT चेन्नई में क्लेम की अर्ज़ी दायर की। बीमा कंपनी (प्रतिवादी) ने मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 की धारा 166(2) के तहत MACT के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि चेन्नई में घटना का कोई भी हिस्सा (कॉज़ ऑफ़ एक्शन) नहीं हुआ। हालांकि, MACT ने इस आपत्ति को खारिज किया। ट्रिब्यूनल का कहना था कि चूंकि बीमा कंपनी का चेन्नई में भी एक बिज़नेस ऑफ़िस है, इसलिए उसके पास अधिकार क्षेत्र की कमी नहीं है। इसके बाद बीमा कंपनी ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत मद्रास हाईकोर्ट में इस फ़ैसले को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि दुर्घटना चित्तूर में हुई, इसलिए सिर्फ़ MACT चित्तूर के पास ही अधिकार क्षेत्र था।
मद्रास हाईकोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट होकर क्लेम करने वाले ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों की जांच की और पाया कि क्लेम करने वाले की अपनी ही अर्ज़ी उसके मामले को कमज़ोर कर रही थी। पूरी अर्ज़ी में ऐसी कोई बात नहीं कही गई, जिससे पता चले कि चेन्नई ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र के भीतर घटना का कोई हिस्सा हुआ था।
क्लेम की अर्ज़ी में क्लेम करने वाले का पता चित्तूर, आंध्र प्रदेश का दर्ज था। दुर्घटना तिरुपति में हुई। कोर्ट ने गौर किया कि बीमा कंपनी की आपत्ति के जवाब में दिए गए अपने हलफ़नामे में क्लेम करने वाले ने सिर्फ़ यह कहा कि वह चेन्नई ट्रिब्यूनल से 150 किलोमीटर दूर रहता है और बीमा कंपनी का हेड ऑफ़िस चेन्नई में है। दावा करने वाले का तर्क था कि चूंकि बीमा कंपनी का चेन्नई में ऑफिस है, इसलिए उसे कोई नुकसान नहीं हुआ और अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) पर उसकी आपत्ति केवल तकनीकी थी। यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम शीला दत्ता और अन्य मामले का हवाला देते हुए, बेंच ने इस तर्क को खारिज किया।
कोर्ट ने आगे बताया कि बीमा कंपनी को पार्टी-रेस्पोंडेंट (प्रतिवादी पक्ष) बनाना अनिवार्य नहीं है, यह वैकल्पिक है। हालांकि, एक बार जब बीमा कंपनी को पार्टी बना लिया जाता है तो धारा 149(2) के तहत केवल नोटिस पाने वाले (Noticee) की तुलना में उसके अधिकार काफी बदल जाते हैं।
मामले का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया,
"अगर बीमा कंपनी केवल नोटिस पाने वाली पार्टी है तो वह केवल उन्हीं आधारों को उठा सकती है जिनकी कानून में धारा 149(2) के तहत अनुमति है। लेकिन अगर वह पार्टी-रेस्पोंडेंट है तो वह न केवल धारा 149(2) के तहत उपलब्ध आधारों को उठा सकती है, बल्कि उन सभी अन्य आधारों को भी उठा सकती है जो उस व्यक्ति के लिए उपलब्ध हैं जिसके खिलाफ दावा किया गया।"
धारा 166(2) को देखते हुए कोर्ट ने समझाया कि दावा करने वाले के पास दावा आवेदन दाखिल करने के लिए असल में चार विकल्प होते हैं, जैसे कि वह जगह जहां वह रहता है, या वह इलाका जहां दुर्घटना हुई, या जहां दावा करने वाला अपना कारोबार करता है, या उस ट्रिब्यूनल की स्थानीय सीमा के भीतर जहां प्रतिवादी रहता है। कोर्ट ने प्रावधान की भाषा में एक महत्वपूर्ण अंतर पर ध्यान दिया कि जहां दावा करने वाला वहां दावा दायर कर सकता है, जहां वह रहता है या कारोबार करता है, वहीं प्रतिवादी के लिए संबंधित विकल्प केवल उस जगह तक सीमित है, जहां प्रतिवादी रहता है। इसमें प्रतिवादी के कारोबार की जगह का कोई जिक्र नहीं है। इस प्रकार, बेंच ने देखा कि ट्रिब्यूनल के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र को तय करते समय उस जगह को विशेष रूप से छोड़ दिया गया, जहां प्रतिवादी अपना कारोबार करता है।
इसमें यह कहा गया:
“इस तरह मुआवज़े के लिए 1988 के एक्ट की धारा 166(1) के तहत एप्लीकेशन कहां दायर की जा सकती है, इसके लिए क्लेम करने वाले के पास तीन विकल्प होते हैं। ये हैं: (a) वह जगह जहाँ वह रहता है, या (b) वह इलाका जहाँ दुर्घटना हुई, या (c) वह जगह जहां क्लेम करने वाला अपना कारोबार करता है। इन तीन विकल्पों के अलावा, क्लेम करने वाले के पास एक चौथा विकल्प भी होता है, जिसके तहत उस ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर भी क्लेम एप्लीकेशन दायर की जा सकती है, जहां प्रतिवादी (Defendant) रहता है। यह ध्यान देना ज़रूरी है कि इस्तेमाल किए गए शब्द हैं 'जिसके अधिकार क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर प्रतिवादी रहता है'। यहां प्रतिवादी के निवास स्थान का ज़िक्र है, न कि उस जगह का जहाँ 'प्रतिवादी अपना कारोबार करता है'।”
कोर्ट ने इस अंतर का कारण बताते हुए कहा,
"हालांकि दावा करने वाला व्यक्ति उस जगह पर भी दावा आवेदन दायर कर सकता है, जहां वह अपना कारोबार करता है, लेकिन वह उस जगह पर भी इसे दायर करना चुन सकता है, जहां प्रतिवादी (Defendant) रहता है। ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) को तय करते समय उस जगह को खास तौर पर छोड़ दिया गया, जहां प्रतिवादी अपना कारोबार करता है।"
बेंच ने इसे 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर, 1908' (CPC) की धारा 20 से भी अलग बताया, जो उस जगह पर मुकदमा दायर करने की इजाज़त देती है, जहां प्रतिवादी अपना कारोबार करता है। बेंच ने कहा कि एक्ट की धारा 166(2) की भाषा अलग है और उसमें ऐसी कोई शर्त नहीं है।
इसके अलावा, कोर्ट ने माना कि धारा 166(2) में 'प्रतिवादी' शब्द में बीमा कंपनी (Insurer) शामिल नहीं है, क्योंकि बीमा कंपनी को पक्षकार बनाना ज़रूरी नहीं बल्कि वैकल्पिक है और किसी भी स्थिति में धारा 168(1) के तहत MACT के लिए बीमा कंपनी को पक्षकार बनाए बिना भी अलग से नोटिस जारी करना ज़रूरी है।
बेंच ने तर्क दिया,
"शायद 1988 के एक्ट की धारा 166(2) में 'या कारोबार करता है' वाक्यांश का इस्तेमाल न करने का एक कारण यह है कि बीमा कंपनी को हमेशा प्रतिवादी के तौर पर शामिल करने की उम्मीद नहीं की जाती।"
उल्लेखनीय है कि बेंच ने ट्रिब्यूनल के सामने शुरुआती चरण में अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति उठाने और अपील के चरण में या अवार्ड (फैसला) सुनाए जाने के बाद आपत्ति उठाने के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर बताया।
कोर्ट ने कहा:
"ट्रिब्यूनल के सामने दावा आवेदन की शुरुआती कार्यवाही में 1988 के एक्ट की धारा 166(2) दावा करने वाले को धारा 166(1) के तहत मुआवज़े के लिए आवेदन करने के कई विकल्प देती है। इसलिए अधिकार क्षेत्र के मामले में बताई गई ज़रूरतों को पूरा करना होगा। हालांकि, जब अपील के चरण में या अवार्ड सुनाए जाने के बाद किसी भी बाद के चरण में ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति उठाई जाती है तो कोड की धारा 21(1) के तहत बताई गई ज़रूरतों को पूरा करना होगा।"
मंटू सरकार बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, मालती सरदार बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और बलवीर बत्रा बनाम द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी के मामलों में तय किए गए उदाहरणों को देखते हुए कोर्ट ने साफ़ किया कि ये मामले अपील या अवार्ड के बाद के चरण में टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन (क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र) पर उठाई गई आपत्तियों से संबंधित थे, जहां CPC की धारा 21(1) के तहत आपत्ति करने वाली पार्टी को यह भी दिखाना होता है कि "न्याय नहीं हो पाया" (failure of justice)। हालांकि, कोर्ट ने माना कि यह शर्त तब लागू नहीं होती जब मामले के गुण-दोष पर निर्णय होने से पहले ही MACT के सामने शुरुआती चरण में आपत्ति उठाई जाती है।
मौजूदा मामले में मामले के गुण-दोष पर निर्णय होने से पहले ही ट्रिब्यूनल के सामने आपत्ति उठाई गई। इसलिए कोर्ट ने माना कि "इस मामले में क्लेम करने वाले ने खुद इंश्योरेंस कंपनी को क्लेम एप्लीकेशन में एक पार्टी के तौर पर शामिल किया और कंपनी ने ट्रिब्यूनल के सामने ही टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन पर आपत्ति जताई। चूंकि क्लेम करने वाले की एप्लीकेशन पर ट्रिब्यूनल द्वारा गुण-दोष के आधार पर निर्णय होना अभी बाकी है, इसलिए 1988 के एक्ट की धारा 166(2) की शर्तों को पूरा करना होगा और कोड की धारा 21(1) यहां लागू नहीं होती है।"
दूसरे शब्दों में, चूंकि क्लेम पर अभी कोई अवार्ड नहीं आया, इसलिए क्लेम करने वाला "न्याय में विफलता न होने" (no failure of justice) वाले उस मानक का सहारा नहीं ले सकता, जो अवार्ड के बाद अपील में चुनौतियों पर लागू होता है। उसे यह दिखाना था कि उसकी क्लेम एप्लीकेशन असल में धारा 166(2) के तहत चार विकल्पों में से किसी एक को पूरा करती है।
यह मानते हुए कि MV Act एक लाभकारी कानून है, जिसका मकसद दुर्घटना पीड़ितों की मुश्किलों को दूर करना है।
इसकी व्याख्या इसी मकसद को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए, कोर्ट ने कहा,
"ऐसी व्याख्या को सही नहीं माना जा सकता जो कानून के प्रावधानों को सीधे पढ़ने से नहीं निकलती, भले ही उसका मकसद कुछ भी हो। ऐसी व्याख्या को स्वीकार नहीं किया जा सकता, जिसे कानून का कोई समर्थन न हो, और कानून की सीधी भाषा के अनुरूप व्याख्या को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।"
ऊपर बताई गई बातों को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि क्लेम करने वाले की अपनी दलीलों में उसका पता चित्तूर में बताया गया, और दुर्घटना तिरुपति में हुई। यह भी देखा गया कि ऐसा कोई दावा नहीं किया गया कि वह चेन्नई में अपना बिज़नेस करता था; यहाँ तक कि जिस गाड़ी से दुर्घटना हुई, उसका ड्राइवर भी चित्तूर का रहने वाला था।
बेंच ने कहा,
"इसलिए यह साफ़ है कि चेन्नई ज़िले की स्थानीय सीमाओं के भीतर कार्रवाई का कोई कारण (Cause of Action) नहीं बना था, जिससे वहां के ट्रिब्यूनल को क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) मिल सके। चेन्नई ट्रिब्यूनल ने यह मानकर ग़लती की थी कि उसके पास क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र है; हाईकोर्ट ने उस आदेश को रद्द करके इस ग़लती को सही किया।"
इन बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश सही ठहराया और निर्देश दिया कि क्लेम एप्लीकेशन की सुनवाई चित्तूर स्थित MACT द्वारा की जाए।
Case: K Rashik v National Insurance Company Ltd & Anr

