Know The Law | गिरफ़्तारी के लिखित आधार न बताने के नतीजे: सुप्रीम कोर्ट ने समझाया
Shahadat
26 Sept 2026 11:56 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिर से कहा कि आरोपी का यह मौलिक और कानूनी अधिकार है कि उसे गिरफ़्तारी के आधार लिखित रूप में बताए जाएं, और गिरफ़्तार व्यक्ति को ये लिखित आधार बिना किसी अपवाद के और सामान्य प्रक्रिया के तहत दिए जाने चाहिए।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चन्दुरकर की बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत यह ज़रूरत सिर्फ़ प्रक्रिया की औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक ज़रूरी संवैधानिक सुरक्षा है जो सभी कानूनों के तहत गिरफ़्तारी पर लागू होती है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और विशेष कानून भी शामिल हैं।
अनुच्छेद 22(1) में कहा गया कि किसी भी गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के आधार बताए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा (जितनी जल्दी हो सके आधार बताए जाने चाहिए) और उसे अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और बचाव करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा।
CrPC की धारा 50(1), जो BNSS की धारा 47 के समान है, इस सुरक्षा को कानूनी रूप देती है। इसके तहत गिरफ़्तार करने वाले अधिकारी को अपराध की पूरी जानकारी या गिरफ़्तारी के अन्य आधार तुरंत बताने होते हैं।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गिरफ़्तारी के आधार बताने का मकसद यह है कि गिरफ़्तार व्यक्ति गिरफ़्तारी का आधार समझ सके और वकील से सलाह ले सके, ताकि गिरफ़्तारी, पुलिस रिमांड या ज़मानत की अर्ज़ी को चुनौती दी जा सके। अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह जानकारी सही तरीके से और ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए जिसे गिरफ़्तार व्यक्ति समझ सके।
कोर्ट ने 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में तय सिद्धांत का हवाला दिया। इस सिद्धांत के अनुसार, अगर पुलिस के पास गिरफ़्तारी का ठोस आधार बताने वाले दस्तावेज़ पहले से मौजूद हैं तो गिरफ़्तारी के समय आरोपी को गिरफ़्तारी के लिखित आधार ज़रूर दिए जाने चाहिए।
मिहिर शाह मामले के फैसले के अनुसार, एक अपवाद तब हो सकता है, जब तुरंत लिखित आधार देना व्यावहारिक न हो, जैसे कि शरीर या संपत्ति के खिलाफ़ अपराध जो 'फ्लैग्रेंट डेलिक्टो' (अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने) की स्थिति में किए गए हों। ऐसे मामलों में आधार शुरू में मौखिक रूप से बताए जा सकते हैं। लेकिन गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उचित समय के भीतर और किसी भी हाल में आरोपी को रिमांड के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से कम से कम दो घंटे पहले दिए जाने चाहिए।
कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:
1. इस बात पर ज़ोर दिया कि अनुच्छेद 22(1) के तहत सुरक्षा उपाय मौलिक सिद्धांत हैं, न कि केवल प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय।
2. इस तर्क को खारिज किया कि ऐसे उल्लंघन को केवल प्रक्रियात्मक चूक माना जा सकता है, जिसका कस्टडी की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही अनुच्छेद 22(1) का पालन न करने पर गिरफ्तारी को अवैध ठहराने से पहले आरोपी को नुकसान (prejudice) साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा कि एक बार उल्लंघन हो जाने पर नुकसान या साबित करने योग्य नुकसान का सवाल ही नहीं उठता।
3. गिरफ्तारी के आधार न बताए जाने के कारण रिहाई और ज़मानत पर रिहाई के बीच अंतर स्पष्ट किया। अनुच्छेद 22(1) के तहत संवैधानिक ज़रूरत का उल्लंघन होने के कारण रिहा किए गए आरोपी को "ज़मानत पर रिहा" नहीं माना जाता, बल्कि उसे अवैध और असंवैधानिक हिरासत से रिहा किया जाता है।
4. इस बात पर ज़ोर दिया कि गिरफ्तारी के आधार बताने की ज़रूरत किसी खास कानून तक सीमित नहीं है। अनुच्छेद 22(1) सभी मामलों में लागू होता है, जिसमें BNS और विशेष कानूनों के तहत गिरफ्तारियां भी शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि यह किसी खास कानून तक सीमित नहीं है और इस सुरक्षा को कमज़ोर करने की किसी भी कोशिश से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।
5. कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन न केवल गिरफ्तारी को, बल्कि उसके बाद की रिमांड को भी अमान्य कर देता है। कोर्ट ने कहा कि बाद में चार्जशीट दाखिल करना या संज्ञान लेने का आदेश उस गिरफ्तारी को वैध नहीं बना सकता जो शुरू से ही असंवैधानिक थी।
कोर्ट का यह निष्कर्ष गिरफ्तारी के आधार बताने से जुड़े पिछले फैसलों की समीक्षा के बाद निकला। इसने मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य और मेघालय राज्य बनाम सोनम रघुवंशी के मामलों में अपने पिछले फैसलों से बनी स्थिति को भी स्पष्ट किया और कहा कि मिहिर राजेश शाह का मामला इस मुद्दे पर बाध्यकारी कानूनी स्थिति को दर्शाता है।
मिहिर शाह मामले के फ़ैसले में कहा गया कि गिरफ़्तारी की वजहें लिखित में बताई जानी चाहिए और वे हालात भी बताए गए, जिनमें कुछ समय के लिए ज़बानी जानकारी दी जा सकती है। साथ ही, ये वजहें उस भाषा में बताई जानी चाहिए जो आरोपी को समझ आती हो।
सोनम रघुवंशी मामले में आरोपी को 9 जून, 2025 को गिरफ़्तार किया गया और गिरफ़्तारी की वजहें उसी दिन उसे बता दी गईं। उसकी आपत्ति यह थी कि वजहों में धारा 103(1) के बजाय BNS की धारा 403(1) का ज़िक्र किया गया था। एक समान बेंच ने इसे साफ़ तौर पर टाइपिंग की गलती माना।
सोनम रघुवंशी मामले के फ़ैसले में एक समान बेंच ने गिरफ़्तारी की वजहें बिल्कुल न बताने और अपर्याप्त वजहें बताने के बीच फ़र्क किया। बेंच ने कहा कि वजहें बिल्कुल न बताने से गिरफ़्तारी अमान्य हो जाएगी, जबकि अपर्याप्त वजहों के मामले में यह देखना होगा कि आरोपी को इससे क्या नुकसान हुआ।
बेंच ने यह भी कहा कि वजहें बताने की ज़रूरत को पूरा न करने और उसके बाद आरोपी को रिहा करने से जांच एजेंसी को जांच के मक़सद से आरोपी को दोबारा गिरफ़्तार करने से नहीं रोका जा सकेगा।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने कहा कि सोनम रघुवंशी मामले का फ़ैसला मिहिर राजेश शाह मामले के फ़ैसले से "अलग राय वाला लग सकता है"। हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि सोनम रघुवंशी मामले का फ़ैसला मौजूदा कानूनी स्थिति को तय नहीं करता। कोर्ट ने बताया कि सोनम रघुवंशी मामले में गिरफ़्तारी मिहिर राजेश शाह मामले से पहले ही हो गई।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए मिहिर राजेश शाह मामले का फ़ैसला ही सही कानूनी स्थिति बताता है और सही कानून तय करता है जो बाध्यकारी है। यह इस कोर्ट द्वारा सालों से विकसित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप है।"
इसके बाद कोर्ट ने वे सुरक्षा उपाय बताए, जिनका पालन किसी ऐसे आरोपी को दोबारा गिरफ़्तार करने की कोशिश के दौरान किया जाना चाहिए, जिसे अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया हो। मिहिर शाह मामले के फ़ैसले के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति को इसलिए रिहा किया जाता है, क्योंकि गिरफ़्तारी के कारण नहीं बताए गए और जांच एजेंसी को अभी भी कस्टडी की ज़रूरत है, तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के पास एक अर्ज़ी देनी होगी। इस अर्ज़ी में कस्टडी की ज़रूरत और कारणों के साथ-साथ यह भी बताना होगा कि शुरू में गिरफ़्तारी के कारण क्यों नहीं बताए गए।
इस मामले में कोर्ट ने मिहिर शाह मामले के फ़ैसले में दी गई सुरक्षा को और मज़बूत किया।
कोर्ट ने कहा –
1. जांच एजेंसी को सबसे पहले आरोपी को गिरफ़्तारी के लिखित कारण बताने होंगे। उसके बाद ही वह कस्टडी या दोबारा गिरफ़्तारी के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट के पास अर्ज़ी दे सकती है।
2. अर्ज़ी में दोबारा गिरफ़्तारी के कारण, कस्टडी में पूछताछ की ज़रूरत और इस बात का स्पष्टीकरण होना चाहिए कि जब आरोपी को पहली बार गिरफ़्तार किया गया, तब गिरफ़्तारी के कारण क्यों नहीं बताए गए।
3. अर्ज़ी पर तुरंत ऊपर के अधिकारी की मंज़ूरी भी होनी चाहिए। इस ज़रूरत का मकसद "किसी भी तरह की गड़बड़ी या मिलीभगत को रोकना" और यह पक्का करना है कि ऊपर के अधिकारी को पता हो कि नीचे के अधिकारी ने संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन किया।
4. मजिस्ट्रेट को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए तेज़ी से, यानी एक हफ़्ते के अंदर, अर्ज़ी पर विचार करना चाहिए। दोबारा गिरफ़्तारी का फ़ैसला उसी अधिकारी की मर्ज़ी पर नहीं छोड़ा जा सकता जिसने अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन किया था। इसे "न्यायिक मंज़ूरी" मिलनी चाहिए।
5. मजिस्ट्रेट दोबारा गिरफ़्तारी की इजाज़त तभी दे सकते हैं, जब वे इस बात से संतुष्ट हों कि पहली बार गिरफ़्तारी के कारण न बताने के पीछे सही वजहें थीं, बाद में कारण बता दिए गए, और फिर भी आरोपी को दोबारा गिरफ़्तार करने की ज़रूरत है।
6. शुरुआती उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी के ख़िलाफ़ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए, और जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपी जानी चाहिए।
Case Details: Jaskaran Jeet Singh Deol v. State of Punjab | Crl.A. No. 4234/2026 Diary No. 35041/2026

