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क्या है फर्जी खबर और IPC की धारा 505 (1) के बीच संबंध, जानिए कौन से मामलों में लागू होगी यह धारा?

SPARSH UPADHYAY
3 April 2020 5:42 AM GMT
क्या है फर्जी खबर और IPC की धारा 505 (1) के बीच संबंध, जानिए कौन से मामलों में लागू होगी यह धारा?
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यह बात हम सभी जानते हैं कि वैसे तो फर्जी खबर को फैलाना एवं इसके फैलने में अपना योगदान देना अपने आप में बिलकुल भी उचित नहीं है, परन्तु आपदा के दौरान फर्जी ख़बरों का वितरण, बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इसके दुष्परिणाम शायद किसी से भी छुपे नहीं हैं।

हाल ही में, अलख आलोक श्रीवास्तव बनाम भारत संघ [Writ Petition(s) (Civil) No(s). 468/2020] के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह टिपण्णी की थी कि फर्जी ख़बरों के जरिये फैलने वाला आतंक, लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है। पीठ का कहना था कि, "हमें उन लोगों को शांत करने की जरूरत है, जो दहशत की स्थिति में हैं।"

इसी क्रम में, पिछले लेख में हमने आपदा संबंधी फर्जी ख़बर को फ़ैलाने के दुष्परिणाम पर चर्चा की थी और यह भी जाना था कि इसको लेकर भारतीय कानून क्या कहता है।

COVID-2019: आपदा संबंधी फर्जी ख़बर फ़ैलाने के क्या हो सकते हैं दुष्परिणाम, जानिए क्या कहता है कानून?

हमने यह भी जाना था कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की 'धारा 54' के अंतर्गत, 'मिथ्या चेतावनी' (False Warning) को दंडनीय बनाया गया है (जोकि बीते 24 मार्च से देश भर में लागू कर दी गयी है)।

यह धारा यह कहती है कि जो कोई, किसी आपदा या उसकी गंभीरता या उसके परिणाम के सम्बन्ध में आतंकित करने वाली मिथ्या संकट – सूचना या चेतावनी देता है, तो वह दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दंडनीय होगा।

इस धारा के अंतर्गत, यदि कोई व्यक्ति ऐसा प्रयास करता है कि किसी आपदा या उसकी गंभीरता के सम्बन्ध में आम जनता के बीच आतंक का फैलाव हो तो उसे इस धारा के अंतर्गत दण्डित किया जा सकता है।

मौजूदा लेख में हम मुख्य रूप से, भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) के बारे में चर्चा करेंगे। हालाँकि, इससे पहले कि हम भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) के बारे में चर्चा की शुरुआत करें, हमारे लिए भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 505 की रूपरेखा को समझ लेना अत्यंत आवश्यक है।

दरअसल, भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 505 के 3 भाग हैं:-

(A) 505 (1) - 'लोक रिष्टिकारक वक्तव्य' (Statements conducing to public mischief) के सम्बन्ध में प्रावधान करती है। इसके अंतर्गत 3 उप खंड हैं [(a)/(क), (b)/(ख) एवं (c)/(ग)]। उपखंड (b)/(ख) को मौजूदा लेख में हम समझेंगे।

(B) धारा 505 (2) - 'विभिन्न वर्गों में शत्रुता, घॄणा या वैमनस्य पैदा या सम्प्रवर्तित करने वाले कथन' (Statements creating or promoting enmity, hatred or ill-will between classes) के सम्बन्ध में प्रावधान करती है

(C) धारा 505 (3) - 'पूजा के स्थान आदि में किया गया उपधारा (2) के अधीन अपराध' [Offence under sub-section (2) committed in place of worship, etc.] के सम्बन्ध में प्रावधान करती है

इसके अलावा, धारा 505 (1) के अंतर्गत (क), (ख) एवं (ग) उप खंड हैं। इस लेख में, जैसा कि हमने जाना, हम सिर्फ धारा 505 (1) के उपखंड (ख) या (b) के विषय में चर्चा करेंगे।

क्या है भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख)?

भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख), उन मामलों से सम्बंधित है, जहाँ किसी कथन, जनश्रुति या सूचना को, इस आशय से कि, या जिससे यह सम्भाव्य हो कि, सामान्य जन या जनता के किसी भाग को ऐसा भय या संत्रास कारित हो, जिससे कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो, रचित, प्रकाशित या परिचालित किया जाता है।

दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति कोई कथन, रुमर (जन श्रुति) या रिपोर्ट को रचता, प्रकाशित या परिचालित करता है और उसका आशय यह हो या यह सम्भावना हो कि सामान्य जन या जनता के किसी वर्ग के बीच यह भय पैदा होगा या अलार्म का वातावरण पैदा होगा, और जिसके चलते कोई व्यक्ति, राज्य के विरुद्ध या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो, तो इस धारा के तहत मामला बनता है।

गौरतलब है कि इस कानून के तहत दोषी ठहराए जाने पर व्यक्ति को अधिकतम तीन साल के कारावास और जुर्माने, अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है।

धारा 505 (1) (b)/(ख) के अंतर्गत अपराध गठित करने के लिए आवश्यक सामग्री:-

1 – अभियुक्त द्वारा किसी कथन, रुमर (जन श्रुति) या रिपोर्ट की रचना, प्रकाशन या परिचालन; एवं

2 – अभियुक्त द्वारा ऐसा इस आशय से किया जाना या ऐसी सम्भावना हो कि सामान्य जन या जनता के किसी भाग के बीच भय पैदा होगा या अलार्म का वातावरण पैदा होगा, और जिसके चलते कोई व्यक्ति, राज्य के विरुद्ध या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए उत्प्रेरित हो जायेगा;

Crl. O.P. No. 22811 of 2019 के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने यह आयोजित किया था कि भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) को आकर्षित करने के लिए, अभियुक्त के कृत्य को जनता या जनता के किसी भी वर्ग के लिए खतरे का कारण बनना चाहिए और इसके चलते, राज्य या सार्वजनिक शांति के खिलाफ अपराध करने के लिए जनता या जनता के किसी भी वर्ग को प्रेरित किया जाना चाहिए।

शिवमोगा (कर्नाटक) का हालिया मामला

[NOTE - हालाँकि, इस मामले के तथ्यों को हम सत्यापित नहीं कर रहे हैं, पर इस लेख को समझने के लिए हम न्यूज़ रिपोर्ट्स में आये तथ्यों का इस्तेमाल भर कर रहे हैं।]

डेक्कन हेराल्ड की खबर के मुताबिक, शिवमोगा (कर्नाटक) तालुक के नारायणपुरा निवासी नागराज (जोकि एक शिक्षक हैं) के खिलाफ कुमसी पुलिस ने हाल ही में फर्जी खबर फैलाने के चलते, भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) के तहत मामला दर्ज किया।

पुलिस अधीक्षक के. एम. शांताराजू के मुताबिक, अभियुक्त नागराज ने व्हाट्सएप के जरिए कोविड-19 पर फर्जी संदेश फैलाकर लोगों में तनाव पैदा किया।

संदेश में यह लिखा था कि कुछ कोविड-19 पॉजिटिव मरीज, शिवमोगा में हैं, और जब तक वे ट्रेस नहीं हो जाते, तब तक लोगों को इलाज के लिए किसी भी अस्पताल में नहीं जाना चाहिए।

न्यू अलीपोर (पश्चिम-बंगाल) का हालिया मामला

[NOTE - हालाँकि, इस मामले के तथ्यों को हम सत्यापित नहीं कर रहे हैं, पर इस लेख को समझने के लिए हम न्यूज़ रिपोर्ट्स में आये तथ्यों का इस्तेमाल भर कर रहे हैं।]

दी इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, इसी प्रकार, न्यू अलीपोर (पश्चिम बंगाल) की एक महिला ने एक व्हाट्सएप ग्रुप पर संदेशों की एक श्रृंखला में यह दावा किया कि उसके पड़ोस में 15 लोग, और उसके घर के पास 2, COVID-19 पॉजिटिव पाए गए थे।

गौरतलब है कि, इस व्हाट्सएप ग्रुप के सदस्यों के बच्चे, एक स्थानीय प्री-स्कूल में पढने जाते हैं। महिला ने व्हाट्सएप ग्रुप सदस्यों से यह आग्रह किया कि वे किराने का सामान खरीदने के लिए अपने परिवार को बाहर न भेजें।

पुलिस ने दावा किया कि महिला के इन संदेशों से व्हाट्सएप ग्रुप सदस्यों के बीच भय एवं अलार्म का वातावरण पैदा हुआ और इसलिए उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) के तहत मामला दर्ज किया गया।

हालाँकि, जैसे कि हमने कहा कि हम इन सभी मामलों के तथ्यों को सत्यापित नहीं कर रहे हैं, यहाँ यह साफ़ किया जाना भी आवश्यक है और पाठकों द्वारा यह ध्यान में भी रखा जाना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 505 (1) (b)/(ख) के तहत दोषसिद्धि के लिए यह दिखाया जाना भी जरुरी है कि अभियुक्त द्वारा किसी कथन, रुमर (जन श्रुति) या रिपोर्ट की रचना, प्रकाशन या परिचालन के चलते, राज्य या सार्वजनिक शांति के विरुद्ध अपराध करने के लिए जनता या जनता के किसी भी वर्ग को प्रेरित किया गया था।

यहाँ इस बात को नोट करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जबतक ऊपर लिखी इस बात को सबित नहीं किया जायेगा, इस धारा के अंतर्गत अभियुक्त की दोषसिद्धि नहीं हो सकती है।

अंत में, यह कहना आवश्यक है कि इस लेख का मकसद आप सभी पाठकगण को सजग एवं सतर्क बनाना है, जिससे आप इस महामारी से बचने के लिए अपने आप को न केवल शारीरिक रूप से सुरक्षित रखें, बल्कि आप मानसिक रूप से भी इससे लड़ने के लिए तैयार रहें।

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