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धारा 102 (3) सीआरपीसी: जानिए जब्त वाहन को बांड पर छोड़ने की पुलिस की शक्ति क्या है?

SPARSH UPADHYAY
4 May 2020 9:16 AM GMT
धारा 102 (3) सीआरपीसी: जानिए जब्त वाहन को बांड पर छोड़ने की पुलिस की शक्ति क्या है?
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अभी हाल ही में मोहम्मद आरिफ जमील बनाम भारत संघ Order on I.A. No. 9/2020 in WP No. 6435/2020 के मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया कि COVID-19 लॉकडाउन दिशानिर्देशों के उल्लंघन करने पर पुलिस द्वारा जब्त किए गए सभी वाहनों को वाहन मालिक को लौटाया जा सकेगा और ऐसा करने के लिए पुलिस अधिकारी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 (3) के तहत शक्ति का प्रयोग करने की अनुमति होगी।

अपने आदेश में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बीते गुरुवार (30-04-2020) को बेंगलुरु पुलिस को 35,000 वाहनों को छोड़ने की अनुमति दी, जिन्हें उनके द्वारा लॉकडाउन मानदंडों के उल्लंघन के चलते जब्त किया गया था।

अब वाहनों के मालिक, सीधे तौर पर पुलिस से संपर्क कर सकते हैं, और COVID-19 दिशानिर्देशों के उल्लंघन के लिए जब्त किए गए वाहनों की कस्टडी प्राप्त करने के लिए उन्हें मजिस्ट्रेट से संपर्क करने की आवश्यकता नहीं है।

इससे पहले 17 अप्रैल 2020 को केरल हाईकोर्ट ने एक सामान्य आदेश पारित किया गया था, जिसमें लॉकडाउन दिशानिर्देशों के उल्लंघन करने पर पुलिस द्वारा जब्त किए गए सभी वाहनों को वाहन मालिक के स्टेशन हाउस ऑफिसर के समक्ष निजी बांड निष्पादन करने और संबंधित दस्तावेज़ जैसे लाइसेंस, आरसी बुक और बीमा प्रमाण पत्र की प्रतियां जमा करने पर वाहन छोड़ने का निर्देश दिया गया था।

दरअसल, इस मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष राज्य सरकार ने यह प्रार्थना की थी कि क्षेत्राधिकार पुलिस अधिकारी को सीआरपीसी की धारा 102 (3) और मोटर वाहन अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करने की अनुमति दी जाए और वाहनों को बांड या किसी अन्य सुरक्षा की प्रस्तुति पर रिलीज (छोड़) करने दिया जाए।

मौजूदा लेख में हम कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश के सम्बन्ध में सीआरपीसी की धारा 102 (3) को सीमित रूप में समझेंगे और यह जानेंगे कि यह प्रावधान क्या कहता है। तो चलिए इस लेख की शुरुआत करते हैं।

धारा 102 के बारे में ख़ास बातें

यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 102, सिर्फ वाहनों को जब्त करने की शक्ति से सम्बंधित नहीं है। इस धारा के अंतर्गत किसी भी प्रकार की संपत्ति का अभिग्रहण (Seizure) किया जा सकता है। हालाँकि यह जरुर है कि यह केवल और केवल पुलिस अधिकारी की शक्ति से सम्बंधित धारा है।

इसके अनुसार, एक पुलिस अधिकारी द्वारा किसी ऐसी संपत्ति को अभिगृहीत (Seize) किया जा सकता है जिसके बारे में यह अभिकथन या संदेह है कि वह चुराई हुई है, अथवा जो ऐसी परिस्थितियों में पाई जाती है, जिनसे किसी अपराध के किए जाने का संदेह हो [धारा 102 (1)]।

गौरतलब है कि नेवादा प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य 2019 (4) KHC 782 (SC) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह तय किया था कि पुलिस के पास आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 102 के तहत अन्वेषण के दौरान 'अचल संपत्ति' को ज़ब्त करने की शक्ति नहीं है।

यह निर्णय तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता, और संजीव खन्ना की पीठ ने सुनाया था। हालांकि, पुलिस के पास आरोपियों की चल संपत्तियों को फ्रीज़ करने का अधिकार है, पीठ ने यह स्पष्ट किया था।

यदि हम बात धारा 102 (3) की करें तो हम देखेंगे कि इस धारा के अंतर्गत, धारा 102 की उपधारा (1) के अधीन कार्य करने वाले प्रत्येक पुलिस अधिकारी को, अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को अभिग्रहण (Seizure) की रिपोर्ट तुरन्त देने का निर्देश दिया गया है।

यानी कि जैसे ही किसी भी संपत्ति का अभिग्रहण (Seizure) किया जाए, इसकी सूचना तुरंत ही अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को दी जानी आवश्यक है।

इसके अलावा, धारा 102 (3) यह भी कहती है कि

"जहाँ अभिगृहीत संपत्ति ऐसी है कि वह सुगमता से न्यायालय में नहीं लाई जा सकती है, या जहाँ ऐसी संपत्ति की अभिरक्षा के लिए उचित स्थान प्राप्त करने में कठिनाई है, या जहाँ अन्वेषण के प्रयोजन के लिए संपत्ति को पुलिस अभिरक्षा में निरंतर रखा जाना आवश्यक नहीं समझा जाता है वहां वह पुलिस अधिकारी, उस संपत्ति को किसी ऐसे व्यक्ति की अभिरक्षा में देगा जो यह वचनबंध करते हुए बंधपत्र निष्पादित करे कि वह संपत्ति को जब कभी अपेक्षा की जाए तब न्यायालय के समक्ष पेश करेगा और उसके व्ययन की बाबत न्यायालय के अतिरिक्त आदेशों का पालन करेगा।"

यदि आसान भाषा में धारा 102 (3) को समझने का प्रयास किया जाए तो यह धारा महज इतना ही कहती है कि जहाँ भी पुलिस अधिकारी किसी संपत्ति को अभिग्राहित (seize) करे [धारा 102 (1) कि शर्तों को ध्यान में रखते हुए] वहां सबसे पहले तो वह सम्बंधित मजिस्ट्रेट को इस बाबत सूचना दे दे।

इसके पश्च्यात, यदि वह यह समझता है कि ऐसी संपत्ति को आसानी से न्यायालय ले जाने में कठनाई होगी, या जहाँ इन्वेस्टीगेशन (अन्वेषण) के लिए उस संपत्ति को पुलिस कस्टडी में रखना जरुरी नहीं या उस संपत्ति की कस्टडी के लिए उचित स्थान नहीं प्राप्त हो पा रहा है, वहां पुलिस द्वारा उस संपत्ति को किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जा सकता है जो एक वचनबंध करते हुए बंधपत्र निष्पादित करे (executing a bond undertaking) कि वह उस संपत्ति को जब कभी अपेक्षा की जाएगी, तब वह न्यायालय के समक्ष पेश करेगा और उसके व्ययन (disposal) से सम्बंधित न्यायालय के अतिरिक्त आदेशों का पालन करेगा।

वाहन जब्त किया जाना, धारा 102 (3) और कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय

यदि बात कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश की करें, तो सबसे पहले वहां राज्य सरकार ने न्यायालय में एक वादकालीन आवेदन (Interlocutory Application) दायर किया था। आवेदन में अदालत से यह निर्देश प्राप्त करने की मांग की गयी कि अधिकार क्षेत्र के पुलिस अधिकारियों को जब्त वाहनों की कस्टडी को सौंपने के लिए सीआरपीसी की धारा 102 की उप-धारा (3) के तहत शक्ति का उपयोग करने के लिए स्वीकृति दी जाए।

इस आवेदन में यह कहा गया था कि 25-03-2020 से लेकर आवेदन दायर करने की तारिख तक, लगभग 35,000 वाहनों को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 188 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 51 (1) (b) के उल्लंघन के लिए बेंगलुरु सिटी की सीमा के भीतर जब्त कर लिया गया है।

आम तौर पर जब इस तरह की जब्ती की जाती है तो वाहनों को छुड़ाने के लिए, उल्लंघनकर्ताओं/वाहन मालिकों को सीआरपीसी के संबंधित प्रावधानों (धारा 451 या 457) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दाखिल करना होता है।

अब चूँकि COVID-19 के खतरे के बीच, न्यायिक मजिस्ट्रेटों को ऐसे आवेदनों से जूझना न पड़े, और न्यायालयों को भीड़ भाड़ से बचाया जा सके, इसलिए सरकार ने उच्च न्यायालय के समक्ष यह आवेदन दायर किया।

राज्य सरकार की ओर से धारा 102 सीआरपीसी की उप-धारा (3) की ओर इंगित करते हुए यह प्रस्तुत किया गया कि इतनी बड़ी संख्या में वाहनों को न्यायालयों में आसानी से नहीं ले जाया जा सकता है, और दूसरी बात, ऐसे वाहनों की सुरक्षित कस्टडी के लिए एक उचित स्थान प्राप्त करना सुनिश्चित करना मुश्किल है।

इसके पश्च्यात, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने गुरुवार को बेंगलुरु पुलिस को 35,000 वाहनों को छोड़ने की अनुमति दी, जिन्हें लॉकडाउन मानदंडों के उल्लंघन के लिए जब्त किया गया था। वाहनों के मालिक अब पुलिस से सीधे संपर्क कर सकते हैं (सम्बंधित मजिस्ट्रेट से संपर्क करने के बजाय) और एक जमा राशि पर वाहन की वापसी कर सकते हैं।

पीठ ने राज्य सरकार की याचिका को अनुमति देते हुए चार पहिया वाहन के लिए 1,000 रुपये और दो पहिया वाहनों के लिए 500 रुपये की सुरक्षा राशि (Security Deposit) तय की।

यह भी आदेश जारी किया गया कि उनके द्वारा जमा करायी गयी राशि को न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने वाहन स्वामी के खिलाफ शुरू किए गए अभियोजन के अंतिम परिणाम के अधीन समायोजित कर लिया जायेगा।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि, COVID-19 के संबंध में निर्देशों के उल्लंघन से संबंधित अपराधों के लिए वाहनों को जब्त करने के मामलों में, अधिकारिता पुलिस अधिकारियों के लिए, सीआरपीसी की धारा 102 की उप-धारा (3) के तहत शक्तियों का प्रयोग करना खुला रहेगा।

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