FIR और शिकायत में फ़र्क़ – पुलिस में क्या, कब और कैसे दर्ज करें?

Praveen Mishra

2 Sept 2025 3:35 PM IST

  • FIR और शिकायत में फ़र्क़ – पुलिस में क्या, कब और कैसे दर्ज करें?

    FIR और शिकायत में फ़र्क़ – पुलिस में क्या, कब और कैसे दर्ज करें?

    हम अक्सर सुनते हैं – “FIR लिखवाओ” या “पुलिस में शिकायत करो”। लेकिन क्या दोनों एक ही चीज़ हैं? नहीं। आइए सरल शब्दों में समझते हैं:

    FIR (First Information Report) क्या है?

    • गंभीर अपराध (Cognizable Offence) होने पर लिखी जाती है – जैसे हत्या, डकैती, बलात्कार, अपहरण आदि।

    • इसमें पुलिस को तुरंत जाँच शुरू करने और आरोपी को गिरफ़्तार करने का अधिकार होता है।

    • FIR हमेशा लिखित रूप में दर्ज होती है और पीड़ित/शिकायतकर्ता को इसकी कॉपी मुफ़्त में दी जाती है।

    • FIR दर्ज होने के बाद केस सीधे क्रिमिनल ट्रायल तक पहुँच सकता है।

    शिकायत (Complaint) क्या है?

    • यह कम गंभीर अपराध (Non-Cognizable Offence) के लिए होती है – जैसे गाली-गलौज, हल्की मारपीट, धमकी आदि।

    • इसमें पुलिस सीधे FIR नहीं लिख सकती। पहले मजिस्ट्रेट से अनुमति लेनी पड़ती है।

    • शिकायत ज़्यादातर थाने में लिखकर या मजिस्ट्रेट कोर्ट में दायर की जाती है।

    • पुलिस तुरंत गिरफ़्तारी नहीं कर सकती, सिर्फ़ रिपोर्ट बना सकती है।

    FIR कब दर्ज कराएँ?

    • जब अपराध गंभीर हो और तुरंत कार्रवाई ज़रूरी हो।

    • उदाहरण: किसी का मर्डर हो गया, अपहरण हुआ या बड़ी चोरी हुई।

    शिकायत कब करें?

    • जब अपराध छोटा हो या पुलिस FIR लिखने से मना कर दे।

    • ऐसे में मजिस्ट्रेट कोर्ट में भी शिकायत दी जा सकती है।


    हर FIR एक शिकायत है, लेकिन हर शिकायत FIR नहीं बनती।

    गंभीर अपराध = FIR, हल्के अपराध = शिकायत।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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