क्या अलग-अलग कमिटल ऑर्डर होने के बावजूद सेशंस कोर्ट जॉइंट ट्रायल कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने समझाया

Shahadat

9 Aug 2026 10:23 PM IST

  • क्या अलग-अलग कमिटल ऑर्डर होने के बावजूद सेशंस कोर्ट जॉइंट ट्रायल कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने समझाया

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि कमिटल ऑर्डर यह तय नहीं करते कि ट्रायल जॉइंट होगा या अलग-अलग; यह फ़ैसला पूरी तरह से ट्रायल कोर्ट का होता है।

    जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,

    "...कमिटल ऑर्डर यह तय नहीं करते कि ट्रायल सिंगल, अलग-अलग या जॉइंट होगा; यह पूरी तरह से कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है।"

    कोर्ट ने कहा कि "कमिटल ऑर्डर सेशंस कोर्ट को उन लोगों के ट्रायल का संज्ञान (कॉग्निज़ेंस) लेने का अधिकार देता है जिन्हें भेजा गया है, लेकिन यह ट्रायल के लिए संज्ञान लेने का आधार नहीं है", यानी यह इस बात को नियंत्रित नहीं करता कि ट्रायल किस तरह से चलाया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने यह स्पष्टीकरण एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें एक ही कथित घटना और उससे जुड़ी FIR से निकले सेशंस ट्रायल में दो कमिटल ऑर्डर जारी किए गए। शुरू में दोनों सेशंस मामलों में सबूत अलग-अलग दर्ज किए गए।

    बाद में सेशंस कोर्ट ने दोनों मामलों को एक साथ मिला दिया और जॉइंट ट्रायल किया। हालांकि, फ़ैसला सुनाते समय कोर्ट ने एक ही दिन दोनों सेशंस मामलों में अलग-अलग फ़ैसले सुनाए।

    जस्टिस चंद्रन द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि जॉइंट ट्रायल में कोई गैर-कानूनी बात नहीं थी, क्योंकि किसी भी आरोपी को कोई नुकसान (Prejudice) नहीं पहुंचा था। कोर्ट ने कहा कि अगर एक या ज़्यादा आरोपी शुरू में अपनी अनुपस्थिति के कारण ट्रायल से बाहर रह जाते हैं, लेकिन ट्रायल शुरू होने से पहले उपलब्ध हो जाते हैं तो सेशंस कोर्ट उन पर अन्य आरोपियों के साथ जॉइंट ट्रायल कर सकता है।

    कोर्ट ने साफ़ किया कि सेशंस कोर्ट ऐसे छूटे हुए आरोपियों के लिए अलग ट्रायल करने के लिए बाध्य नहीं है, सिर्फ़ इसलिए कि अलग-अलग कमिटल ऑर्डर जारी किए गए; जॉइंट ट्रायल करना है या अलग-अलग, यह फ़ैसला कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।

    कोर्ट ने कहा,

    “जब अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग कमिटमेंट (मामले को सेशन कोर्ट भेजने का आदेश) किए जाते हैं और वे धारा 233 के अपवाद के दायरे में नहीं आते, तो उन पर एक ही ट्रायल में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। लेकिन, अगर अलग-अलग कमिटमेंट ऑर्डर हों; (i) ऐसे लोगों के लिए जिन पर एक साथ मुकदमा चलाया जा सकता है या (ii) एक ही व्यक्ति के लिए ऐसे अपराधों के मामले में जिन पर एक साथ मुकदमा चलाया जा सकता है तो आरोपी पर एक ही ट्रायल में मुकदमा चलाया जा सकता है। किसी खास अपराध या अपराधों को मिलकर या एक ही घटनाक्रम के दौरान करने के आरोपी लोगों पर अक्सर एक ही समय पर मुकदमा नहीं चलाया जाता, क्योंकि उनमें से कुछ उपलब्ध नहीं होते। जब वे बाद में उपलब्ध होते हैं और उन्हें कमिट किया जाता है, तो सेशन जज दो अलग-अलग ट्रायल करने के लिए बाध्य नहीं होते (हर कमिटमेंट के लिए एक), बशर्ते पहले मामले का ट्रायल शुरू न हुआ हो।”

    Cause Title: Brajesh Kumar @ Birjesh Kumar Singh Versus The State of Bihar

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