क्या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं 1972 अधिनियम के तहत ग्रेच्युटी पाने की हकदार हैं?
Himanshu Mishra
27 Jan 2025 12:30 PM

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मनीबेन मगनभाई भरिया बनाम डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट ऑफिसर, दाहोद एवं अन्य (2022) मामले में यह तय किया कि क्या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (Anganwadi Workers - AWWs) और सहायिकाएं (Helpers - AWHs) 1972 के ग्रेच्युटी अधिनियम (Gratuity Act, 1972) के तहत ग्रेच्युटी पाने की हकदार हैं।
यह निर्णय न केवल इन कार्यकर्ताओं के अधिकारों को स्पष्ट करता है, बल्कि उन कानूनी प्रावधानों पर भी प्रकाश डालता है जो इन पर लागू होते हैं।
ग्रेच्युटी अधिनियम, 1972: एक सामाजिक कल्याण कानून (Gratuity Act, 1972: A Social Welfare Legislation)
ग्रेच्युटी अधिनियम, 1972 एक सामाजिक कल्याण कानून (Social Welfare Legislation) है, जो कर्मचारियों को उनके सेवा काल के अंत में वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है। यह अधिनियम उन सभी प्रतिष्ठानों (Establishments) पर लागू होता है, जहां दस या उससे अधिक कर्मचारी काम करते हैं।
अधिनियम के तहत, यदि कोई कर्मचारी कम से कम पांच वर्षों तक निरंतर सेवा करता है, तो उसे सेवानिवृत्ति (Superannuation), इस्तीफे (Resignation) या सेवानिवृत्ति (Retirement) पर ग्रेच्युटी पाने का अधिकार है। अदालत ने इसे केवल एक मौद्रिक लाभ (Monetary Benefit) नहीं, बल्कि कर्मचारियों के प्रति एक सामाजिक सुरक्षा उपाय (Social Security Measure) के रूप में देखा।
आंगनवाड़ी केंद्र: एक प्रतिष्ठान के रूप में (Anganwadi Centres as Establishments)
सुप्रीम कोर्ट ने आंगनवाड़ी केंद्रों (Anganwadi Centres) को ग्रेच्युटी अधिनियम के तहत "प्रतिष्ठान" (Establishments) के रूप में मान्यता दी। अधिनियम की धारा 1(3)(b) में प्रतिष्ठानों को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, जिसमें किसी राज्य के कानून के तहत चलने वाले प्रतिष्ठान शामिल हैं।
आंगनवाड़ी केंद्र, जो एकीकृत बाल विकास योजना (Integrated Child Development Services - ICDS) के तहत स्थापित किए गए हैं, व्यवस्थित और संगठित गतिविधियां (Organized Activities) करते हैं।
इनमें पूर्व-विद्यालय शिक्षा (Preschool Education), पोषण सहायता (Nutritional Support) और स्वास्थ्य सेवाएं (Health Services) शामिल हैं। ये गतिविधियां सरकारी और कर्मचारियों के बीच सहयोग से संचालित होती हैं, जिससे ये प्रतिष्ठान की परिभाषा में फिट होते हैं।
रोजगार का स्वरूप: ग्रेच्युटी का अधिकार (Nature of Employment: Gratuity Entitlement)
अदालत ने यह विश्लेषण किया कि क्या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं 1972 अधिनियम की धारा 2(e) के तहत कर्मचारी (Employees) मानी जा सकती हैं। इस धारा में कर्मचारी को किसी भी प्रकार के कार्य (चाहे कुशल हो या अकुशल) में संलग्न व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है।
अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि ये कार्यकर्ता केवल अंशकालिक (Part-time) स्वयंसेवक (Volunteers) हैं। उनके कार्यों में शामिल हैं:
• पूर्व-विद्यालय शिक्षा और पोषण सहायता प्रदान करना।
• स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम (Health Awareness Programs) आयोजित करना।
• आपात स्थितियों (Emergencies) में सेवाएं प्रदान करना, जैसे COVID-19 महामारी के दौरान।
हालांकि, उनके पारिश्रमिक (Remuneration) को "मानदेय" (Honorarium) कहा जाता है, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि यह "वेतन" (Wages) के अंतर्गत आता है, जिससे वे ग्रेच्युटी के पात्र (Eligible) बनते हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की कानूनी जिम्मेदारियां (Statutory Duties of Anganwadi Workers and Helpers)
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं कई महत्वपूर्ण कानूनी जिम्मेदारियां निभाती हैं:
1. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (National Food Security Act, 2013):
इस अधिनियम की धारा 4 से 6 के तहत, आंगनवाड़ी केंद्र गर्भवती महिलाओं (Pregnant Women), स्तनपान कराने वाली माताओं (Lactating Mothers) और 6 महीने से 6 साल के बच्चों को पोषण सहायता प्रदान करते हैं। यह कार्य संविधान के अनुच्छेद 47 (Article 47) के तहत राज्य की जिम्मेदारियों को पूरा करता है।
2. शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right to Education Act, 2009):
धारा 11 के तहत, 3 से 6 साल के बच्चों के लिए निःशुल्क पूर्व-विद्यालय शिक्षा (Free Preschool Education) प्रदान करना आवश्यक है, जिसे आंगनवाड़ी केंद्र निभाते हैं।
3. अन्य सरकारी योजनाएं (Other Government Schemes):
ये कार्यकर्ता स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा से जुड़ी कई सरकारी योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करते हैं।
कल्याणकारी कानूनों की लाभकारी व्याख्या (Beneficial Interpretation of Welfare Legislation)
अदालत ने लाभकारी व्याख्या (Beneficial Interpretation) के सिद्धांत पर जोर दिया। यह कहा गया कि सामाजिक कल्याण के लिए बनाए गए कानूनों की व्याख्या उदारतापूर्वक (Liberally) की जानी चाहिए ताकि अधिकतम लाभ सुनिश्चित हो सके।
महत्वपूर्ण न्यायिक मिसालें (Judicial Precedents Supporting the Decision)
इस निर्णय में कई महत्वपूर्ण मिसालों का हवाला दिया गया:
• State Bank of India v. Shri N. Sundara Money (1976): इस मामले में ग्रेच्युटी को एक सामाजिक सुरक्षा उपाय और कानूनी अधिकार माना गया।
• Bangalore Water Supply and Sewerage Board v. A. Rajappa (1978): इस मामले में "उद्योग" (Industry) की परिभाषा का विस्तार करते हुए इसे संगठित गतिविधियों (Organized Activities) तक बढ़ाया गया।
• Ahmedabad Private Primary Teachers' Association v. Administrative Officer (2004): इस निर्णय में गैर-शिक्षण कर्मचारियों (Non-teaching Staff) को भी ग्रेच्युटी के दायरे में लाया गया।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के अधिकारों को मान्यता देता है। यह उनके समाज में योगदान, विशेष रूप से बाल विकास (Child Development), स्वास्थ्य (Health), और शिक्षा (Education) के क्षेत्रों में, को स्वीकार करता है।
अदालत ने सरकार को उनकी कार्य परिस्थितियों में सुधार करने और उचित सामाजिक सुरक्षा उपाय (Social Security Measures) प्रदान करने का सुझाव दिया। यह निर्णय न्यायपालिका की सामाजिक न्याय (Social Justice) के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।