बच्चे का खर्च न देने भर से पिता पर JJ Act के तहत क्रूरता का केस नहीं बनता: केरल हाईकोर्ट

Amir Ahmad

29 Aug 2026 1:26 PM IST

  • बच्चे का खर्च न देने भर से पिता पर JJ Act के तहत क्रूरता का केस नहीं बनता: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ बच्चे का भरण-पोषण खर्च नहीं देने के आधार पर पिता के खिलाफ किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के तहत बच्चे के साथ क्रूरता का मामला नहीं चलाया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि उस व्यक्ति के पास बच्चे की वास्तविक देखभाल या नियंत्रण था।

    कोर्ट ने विदेश में काम कर रहे एक पिता के खिलाफ इसी आधार पर शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

    जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने कहा कि केवल बच्चे का पिता होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 के तहत बच्चे की वास्तविक देखभाल या नियंत्रण में था। इस धारा के तहत तभी अपराध बनता है जब आरोपी के पास बच्चे की वास्तविक जिम्मेदारी या नियंत्रण हो और वह जानबूझकर उसकी उपेक्षा, परित्याग या दुर्व्यवहार करे अथवा ऐसे किसी आचरण का कारण बने, जिससे बच्चे को मानसिक या शारीरिक पीड़ा पहुंचने की आशंका हो।

    कोर्ट ने कहा,

    "सिर्फ पिता होने का तथ्य अपने आप में धारा 75 की वैधानिक शर्त को पूरा नहीं करता।"

    मामला एक किशोर की मां की ओर से की गई निजी शिकायत से जुड़ा था। मां ने मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत देकर आरोप लगाया कि बच्चे के पिता ने उसे छोड़ दिया और उसकी देखभाल तथा भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाई। मजिस्ट्रेट ने शिकायत पुलिस को भेज दी, जिसके बाद मामला दर्ज किया गया। जांच के बाद पुलिस ने धारा 75 के तहत अपराध का आरोप लगाते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल की।

    इसके बाद पिता ने केरल हाईकोर्ट का रुख किया और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अंतिम रिपोर्ट और आगे की आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की। अब यही प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 में है।

    पिता की ओर से दलील दी गई कि उनका नाबालिग बेटा अपनी मां के साथ रह रहा है और उसकी तथा उसकी मां की जरूरतें उनकी आय देने वाली संपत्तियों से पूरी हो रही हैं। उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने जानबूझकर बच्चे की देखभाल या भरण-पोषण की उपेक्षा की।

    वहीं, पत्नी की ओर से याचिका का विरोध किया गया। उनका कहना था कि पिता द्वारा बच्चे की बुनियादी जरूरतों और भरण-पोषण का खर्च उपलब्ध नहीं कराना ऐसी बात नहीं है, जिसे नजरअंदाज किया जा सके।

    दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने धारा 75 के तहत अपराध के लिए जरूरी शर्तों की जांच की।

    कोर्ट ने पाया कि संबंधित समय में बच्चा अपनी मां के साथ रह रहा है, जबकि पिता विदेश में काम कर रहे थे। रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उस समय बच्चे की वास्तविक देखभाल या नियंत्रण पिता के पास है।

    कोर्ट ने कहा कि धारा 75 के तहत अपराध साबित करने के लिए सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी बच्चे का पिता है। यह भी दिखाना जरूरी है कि उसके पास बच्चे की वास्तविक जिम्मेदारी या नियंत्रण है और ऐसी स्थिति में रहते हुए उसने जानबूझकर बच्चे की उपेक्षा की, उसे छोड़ दिया या उसके साथ ऐसा व्यवहार किया, जिससे उसे अनावश्यक मानसिक या शारीरिक पीड़ा होने की संभावना है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे पिता की ओर से भरण-पोषण का भुगतान नहीं किया जाना, जिसके पास बच्चे की वास्तविक देखभाल या नियंत्रण होने की बात साबित नहीं हुई, अपने आप में जेजे एक्ट की धारा 75 के तहत अपराध नहीं बनता। रिश्ते के आधार पर इस धारा में दिए गए अपराध के जरूरी तत्वों का दायरा नहीं बढ़ाया जा सकता।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि पिता के खिलाफ धारा 75 के तहत अपराध के जरूरी तत्व पूरे नहीं होते। कोर्ट ने पिता की याचिका मंजूर करते हुए उनके खिलाफ दाखिल अंतिम रिपोर्ट और आगे की आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

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