महिला वकील उत्कृष्ट, मगर बेंच पर उनका प्रतिनिधित्व बेहद कम: केरल हाइकोर्ट से विदाई लेते हुए जस्टिस वी.जी. अरुण ने व्यक्त की पीड़ा

Amir Ahmad

24 Jan 2026 12:21 PM IST

  • महिला वकील उत्कृष्ट, मगर बेंच पर उनका प्रतिनिधित्व बेहद कम: केरल हाइकोर्ट से विदाई लेते हुए जस्टिस वी.जी. अरुण ने व्यक्त की पीड़ा

    केरल हाइकोर्ट के जस्टिस वी. जी. अरुण ने शुक्रवार (23 जनवरी) को अपने विदाई संबोधन में न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भले ही केरल में उत्कृष्ट महिला वकील मौजूद हैं लेकिन न्यायिक पीठ पर उनका प्रतिनिधित्व बेहद कम है, जो उन्हें परेशान करता है। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि निकट भविष्य में यह स्थिति बदलेगी।

    जस्टिस अरुण ये टिप्पणियां केरल हाइकोर्ट में आयोजित फुल कोर्ट रेफरेंस के दौरान कर रहे थे। वह रिटायरमेंट की आयु पूरी करने के बाद पद से मुक्त हुए।

    उन्होंने कहा,

    “मैं यह कह सकता हूं कि मुझे इस बात की चिंता है कि हमारे पास उत्कृष्ट महिला वकील होने के बावजूद पीठ पर उनका प्रतिनिधित्व बेहद कम है। मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में इसमें बदलाव आएगा। वायनाड, थलसेरी और अलाप्पुझा न्यायिक जिलों के पोर्टफोलियो जज के रूप में युवा न्यायिक अधिकारियों के साथ मेरा संवाद मुझे केरल न्यायपालिका के भविष्य को लेकर बहुत आशावान बनाता है, जो हमेशा देश में एक कदम आगे रही है।”

    अपने विदाई भाषण में जस्टिस अरुण ने अपने परिवार, पीठ पर सहयोगी जजों बार के सदस्यों, अदालत के कर्मचारियों और रजिस्ट्री के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपने करीबी मित्र और दिवंगत वकील अनिल शिवरामन को विशेष रूप से याद करते हुए उन्हें अपना विश्वासपात्र बताया।

    उन्होंने कहा कि उनके जीवन और न्यायिक कार्य का मार्गदर्शक हमेशा स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व की त्रयी रही है।

    जस्टिस अरुण ने कहा,

    “एक जज के रूप में मेरी मार्गदर्शक शक्ति हमेशा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत रहे हैं, जो हमारी महान लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा हैं। जैसा कि डॉ. आंबेडकर ने कहा था, इन तीनों में से किसी एक की उपेक्षा लोकतंत्र के उद्देश्य को विफल कर देती है। मैं इस गरिमामय संस्था से यह विश्वास लेकर विदा हो रहा हूं कि पीठ और बार के मेरे सहयोगी इन मूल्यों को बनाए रखने का प्रयास जारी रखेंगे।"

    रिटायरमेंट को उन्होंने पूर्ण विराम नहीं बल्कि एक सेमीकोलन बताते हुए कहा कि अब वह फैसले लिखे बिना फैसले पढ़ने, लंबे समय से उपेक्षित पुस्तकों की ओर लौटने और अदालत के बाहर के जीवन को समझने के लिए उत्सुक हैं।

    जस्टिस वी. जी. अरुण प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार और सार्वजनिक बुद्धिजीवी स्वर्गीय टी. के. जी. नायर और श्रीमती सुलोचना वी. नायर के पुत्र हैं। उनका परिवार कानून जगत से गहराई से जुड़ा रहा है। उनकी माता केरल हाइकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस वी. शिवरामन नायर की बहन थीं। कर्नाटक हाइकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन, सीनियर एडवोकेट वी. राजेंद्रन और दिवंगत एडवोकेट अनिल शिवरामन उनके रिश्तेदारों में शामिल हैं।

    उन्होंने कोट्टायम के बेसिलियस कॉलेज से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएट किया और बाद में तिरुवनंतपुरम स्थित केरल लॉ अकादमी से कानून की पढ़ाई की। 8 जनवरी 1989 को वकील के रूप में नामांकन के बाद उन्होंने कोझिकोड में प्रैक्टिस शुरू की और दिसंबर, 1990 में केरल हाइकोर्ट में सीनियर एडवोकेट टी. आर. रमन पिल्लै के अधीन कार्य किया।

    वह 2005 से पीठ पर नियुक्ति तक इंडियन लॉ रिपोर्ट्स की केरल श्रृंखला के संपादक भी रहे और केरल लॉ जर्नल से भी जुड़े रहे।

    फुल कोर्ट रेफरेंस की अध्यक्षता करते हुए जस्टिस ए. के. जयशंकरन नाम्बियार ने जस्टिस अरुण को एक प्रिय मित्र और भाई जज बताते हुए उनकी बौद्धिक गंभीरता, सुरुचिपूर्ण फैसलों और केरल ज्यूडिशियल अकादमी में उनके योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि जस्टिस अरुण के निर्णय सिद्धांतगत स्पष्टता और व्यावहारिक विवेक का दुर्लभ संतुलन दर्शाते हैं।

    एडवोकेट जनरल गोपालकृष्ण कुरुप ने सुकरात के शब्दों का हवाला देते हुए कहा कि एक अच्छे जज में विनम्रता से सुनना बुद्धिमानी से उत्तर देना संयम से विचार करना और निष्पक्ष निर्णय देना जैसे गुण होने चाहिए और जस्टिस अरुण का पूरा करियर इन आदर्शों का जीवंत उदाहरण रहा है।

    केरल हाइकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पीयूष ए. कोट्टम ने जस्टिस अरुण को बार-फ्रेंडली जज बताते हुए कहा कि उनका कोर्ट अनुशासनपूर्ण था लेकिन कभी डराने वाला नहीं। उनकी शांत मुस्कान ने अदालत के माहौल को भरोसे और आत्मविश्वास से भर दिया।

    जस्टिस अरुण के विदाई भाषण के बाद जस्टिस नाम्बियार के आग्रह पर पूरा कोर्ट रूम तालियों की गूंज से भर उठा।

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