न्याय केवल तेजी से नहीं, संवेदनशीलता के साथ भी मिलना चाहिए : जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी
Amir Ahmad
6 March 2026 2:28 PM IST

केरल हाइकोर्ट में गुरुवार को जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी को विदाई देने के लिए विशेष समारोह आयोजित किया गया। जस्टिस धर्माधिकारी को हाल ही में मद्रास हाइकोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया।
अपने विदाई संबोधन में जस्टिस धर्माधिकारी ने कहा कि केरल की सक्रिय बार और अधिकारों के प्रति जागरूक नागरिक राज्य की मजबूत लोकतांत्रिक भावना को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि यहां का कानूनी वातावरण काफी अलग है।
उन्होंने कहा,
“केरल में बार एसोसिएशन बेहद सक्रिय और मुखर है तथा यहां के नागरिक अत्यंत शिक्षित और अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। मध्य प्रदेश के अपेक्षाकृत पारंपरिक कानूनी माहौल से आने के कारण मुझे ऐसे वातावरण में जल्दी ढलना पड़ा जहां हर प्रशासनिक निर्णय पर जागरूक नागरिक समाज की नजर रहती है।”
जस्टिस धर्माधिकारी ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाइकोर्ट से केरल आने के दौरान भाषा और सांस्कृतिक परिवेश में बदलाव एक चुनौती था। हिंदी भाषी महाकौशल क्षेत्र से मलयालम भाषी राज्य में आने के कारण शुरुआती समय में स्थानीय संदर्भों को समझना कठिन रहा।
उन्होंने कहा कि साथी जजों के मार्गदर्शन ने उन्हें इन परिस्थितियों को समझने और काम करने में काफी मदद की। जस्टिस धर्माधिकारी ने केरल की बार की विद्वता और पेशेवर आचरण की भी सराहना की और कहा कि उनके तर्क अक्सर सटीकता के बेहतरीन उदाहरण होते हैं।
चेन्नई में नई जिम्मेदारी संभालने से पहले उन्होंने कहा कि मद्रास हाइकोर्ट देश के सबसे पुराने और ऐतिहासिक हाइकोर्टों में से एक है और वहां सेवा देना उनके लिए सम्मान की बात है।
उन्होंने कहा,
“मेरा लक्ष्य हमेशा यही रहेगा कि आम आदमी का न्यायपालिका पर भरोसा अटूट बना रहे और न्याय केवल तेजी से ही नहीं बल्कि संवेदनशीलता के साथ भी दिया जाए।”
इस अवसर पर केरल हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस सौमेन सेन ने कहा कि जस्टिस धर्माधिकारी का कार्यकाल छोटा होने के बावजूद प्रभावशाली रहा। उन्होंने बताया कि जस्टिस धर्माधिकारी ने एकल और खंडपीठ दोनों में बैठकर अनेक प्रकार के मामलों की सुनवाई की और उनके निर्णयों में कानून की गहरी समझ तथा स्पष्ट तर्क दिखाई देते हैं।
चीफ जस्टिस सेन ने कहा,
“एक जज के रूप में निर्णय लेना संवैधानिक ढांचे के भीतर अधिकार और संयम दोनों का संतुलन मांगता है। जस्टिस धर्माधिकारी ने अपने फैसलों में इस संतुलन को हमेशा बनाए रखा है।”
कार्यक्रम में एडिशनल एडवोकेट जनरल अशोक एम. चेरियन ने जस्टिस धर्माधिकारी के वकील के रूप में शुरुआती कार्यकाल को भी याद किया। उन्होंने विशेष रूप से भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए वेलफेयर कमिश्नर की ओर से किए गए उनके कानूनी कार्य की सराहना की और इसे सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का उदाहरण बताया।
वहीं केरल हाइकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पीयूष ए. कोट्टम ने कहा कि कम समय में ही जस्टिस धर्माधिकारी ने अपनी निष्पक्षता और कानूनी दक्षता से बार का विश्वास और सम्मान अर्जित किया।
जस्टिस धर्माधिकारी ने नागपुर विश्वविद्यालय से वाणिज्य और कानून की पढ़ाई पूरी की थी और बाद में मध्य प्रदेश हाइकोर्ट में वकालत शुरू की। वर्ष 2000 से 2015 तक वे भारत सरकार के स्थायी वकील रहे। उन्हें 7 अप्रैल 2016 को मध्य प्रदेश हाइकोर्ट का एडिशनल जज नियुक्त किया गया था और 17 मार्च 2018 को स्थायी जज बनाया गया। अप्रैल 2025 में उनका तबादला केरल हाइकोर्ट में हुआ, जहां उन्होंने 23 अप्रैल 2025 को पद की शपथ ली थी।

