POCSO पीड़िता की उम्र तय करने के लिए केवल किशोर न्याय कानून ही एकमात्र आधार नहीं, मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य भी मान्य: केरल हाइकोर्ट
Amir Ahmad
8 Jan 2026 6:17 PM IST

केरल हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के मामलों में पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए किशोर न्याय अधिनियम अथवा उसके नियम ही एकमात्र तरीका नहीं हैं।
अदालत ने कहा कि पीड़िता की आयु तय करने के लिए मौखिक साक्ष्य और दस्तावेजी साक्ष्य पर भी भरोसा किया जा सकता है।
जस्टिस बेच्चू कुरियन थॉमस ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम की धारा 34 तथा पूर्व के खंडपीठ के निर्णयों का परीक्षण करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि यह कानून यह नहीं कहता कि यदि पीड़िता बच्ची है तो उसकी उम्र केवल किशोर न्याय कानून के तहत ही निर्धारित की जाएगी। जब यह प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति बच्चा है या नहीं तो विशेष अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वयं संतुष्ट होकर निर्णय लेना होता है। साक्ष्य कानून के सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू किए जा सकते हैं और किशोर न्याय कानून केवल आयु निर्धारण के तरीकों में से एक हो सकता है, न कि एकमात्र तरीका।
हाइकोर्ट यह टिप्पणी उस अपील पर सुनवाई करते हुए कर रही थी, जिसमें अपीलकर्ता को नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम के तहत दोषी मानते हुए दस वर्ष के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। साथ ही पीड़िता को मुआवजा देने का भी आदेश दिया था।
अभियोजन के अनुसार, अभियुक्त ने वर्ष 2015 से 2016 के बीच पीड़िता के घर में उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया। पीड़िता और उसकी मां ने अदालत में बयान देकर घटनाओं की पुष्टि की, जबकि चिकित्सकीय जांच में भी यौन शोषण के संकेत मिले। पीड़िता का जन्म प्रमाण पत्र भी पंचायत सचिव के माध्यम से अदालत में पेश किया गया।
अपीलकर्ता ने हाइकोर्ट में यह तर्क दिया कि पीड़िता की उम्र विधि अनुसार सिद्ध नहीं की गई है। उसका कहना था कि प्रस्तुत जन्म प्रमाण पत्र में केवल माता-पिता का विवरण है और चूंकि पीड़िता की एक बहन भी है। इसलिए प्रमाण पत्र किसी और का भी हो सकता है। इस आधार पर उसने संदेह का लाभ मांगा।
अदालत ने पीड़िता, उसकी मां और चिकित्सकीय साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए कहा कि अभियोजन ने प्रारंभिक तथ्यों को स्पष्ट रूप से सिद्ध कर दिया। ऐसे में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम की धारा 29 के तहत अभियुक्त के विरुद्ध वैधानिक अनुमान लागू हो जाता है।
अदालत ने कहा कि जब पीड़िता का बयान अडिग और विश्वसनीय हो, तो प्रारंभिक तथ्य स्थापित माने जाते हैं।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि साक्ष्य अधिनियम के तहत मौखिक साक्ष्य और सार्वजनिक अभिलेखों में दर्ज प्रविष्टियां, जैसे जन्म प्रमाण पत्र, आयु निर्धारण के लिए प्रासंगिक हैं। पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र और पीड़िता के स्पष्ट बयान से उसकी उम्र सिद्ध होती है।
इन सभी तथ्यों के आधार पर केरल हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी और कहा कि पीड़िता की उम्र तथा अभियुक्त का अपराध दोनों विधि अनुसार सिद्ध हैं।

