कर्नाटक हाईकोर्ट में बताया गया: इनकम टैक्स एक्ट के तहत 'जीवनसाथी' वाले फ़ायदों से समलैंगिक जोड़ों को बाहर रखना आर्टिकल 15 का उल्लंघन

  • कर्नाटक हाईकोर्ट में बताया गया: इनकम टैक्स एक्ट के तहत जीवनसाथी वाले फ़ायदों से समलैंगिक जोड़ों को बाहर रखना आर्टिकल 15 का उल्लंघन

    शुक्रवार (9 अक्टूबर) को कर्नाटक हाईकोर्ट को बताया गया कि इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के तहत 'जीवनसाथी' वाले फ़ायदों से समलैंगिक जोड़ों को बाहर रखना लिंग के आधार पर भेदभाव है और यह संविधान के आर्टिकल 15 का उल्लंघन करता है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश होते हुए डॉ. ध्रुव जानसेन-संघवी ने जस्टिस बी एम श्याम प्रसाद के सामने तर्क दिया कि यह मामला मूल रूप से आर्टिकल 15 के तहत समानता के बारे में है, न कि समलैंगिक जोड़ों के शादी करने के अधिकार के बारे में।

    यह चुनौती इनकम टैक्स एक्ट की धारा 56(2)(x) के पांचवें प्रावधान (Proviso) के तहत 'जीवनसाथी' की व्याख्या से जुड़ी है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह प्रावधान विषम-लिंगी (Heterosexual) जीवनसाथियों को मिलने वाले टैक्स फ़ायदे से समलैंगिक पार्टनर को बाहर रखता है।

    यह मामला 22-कैरेट सोने के ब्रेसलेट से जुड़ा है, जिसे परिवार की विरासत (Heirloom) बताया जाता है और कहा जाता है कि एक पार्टनर ने दूसरे को उनके रिश्ते की सालगिरह पर तोहफ़े में दिया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अगर वे शादीशुदा विषम-लिंगी जोड़े होते, तो इस तोहफ़े पर कोई टैक्स नहीं लगता।

    डॉ. जानसेन-संघवी ने ASG अरविंद कामथ की दलीलों का जवाब देते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं का मामला सबसे पहले और मुख्य रूप से आर्टिकल 15 पर आधारित है, न कि आर्टिकल 14 पर।

    उन्होंने कहा,

    "....हम कोई खास बर्ताव नहीं मांग रहे हैं। हम बस इतना कह रहे हैं कि हमारे पैरों से बेड़ियाँ हटा दें और हमारे साथ बराबरी का बर्ताव करें..."

    उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं और विषम-लिंगी जोड़े के बीच एकमात्र अंतर तोहफ़ा पाने वाले का लिंग है, जो संविधान के तहत एक अस्वीकार्य वर्गीकरण है।

    कोर्ट को एक्ट की धारा 56 के तहत 'रिश्तेदार' (Relative) की परिभाषा की बारीकियों के बारे में भी बताया गया। डॉ. संघवी ने तर्क दिया कि यह परिभाषा एक्ट की धारा 2 (41) के तहत दी गई परिभाषा से कहीं ज़्यादा व्यापक है [रिश्तेदार का मतलब है पति, पत्नी, भाई या बहन या उस व्यक्ति का कोई सीधा पूर्वज या वंशज]। बता दें, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पिछली बार तर्क दिया था कि सेक्शन 56(2)(x) में 'जीवनसाथी' (Spouse) शब्द को इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 2(41) के साथ समझा जाना चाहिए, जो 'रिश्तेदार' (Relative) को परिभाषित करता है। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रावधान में पति या पत्नी के अलावा, कुछ खास अन्य रिश्ते भी शामिल हैं।

    याचिकाकर्ताओं ने बताया कि सेक्शन 56(2)(x) के स्पष्टीकरण (Explanation) में न केवल जीवनसाथी, बल्कि जीवनसाथी के भाई-बहन, व्यक्ति के माता-पिता में से किसी के भाई-बहन, और जीवनसाथी के सीधे पूर्वज और वंशज भी शामिल हैं; ये ऐसी श्रेणियां हैं जो सेक्शन 2(41) में नहीं मिलती हैं।

    उन्होंने तर्क दिया,

    "....धारा 56 के तहत रिश्तेदार की परिभाषा धारा 2(41) की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है। यह केवल उन चीज़ों की सूची नहीं है, जो धारा 2(41) में शामिल हैं। यहीं पर [SG द्वारा दिए गए तर्क में] तार्किक गलती है।"

    इस मोड़ पर कोर्ट ने पूछा कि यह बात याचिकाकर्ता के मामले में कैसे मदद करती है।

    वकील ने जवाब दिया:

    "....1998 तक गिफ्ट टैक्स एक्ट लागू था और उसे खत्म कर दिया गया। 2004 तक ये सभी कैपिटल रिसिप्ट (पूंजीगत प्राप्तियां) थीं और असल में इनकम (आय) के दायरे में नहीं आती थीं। 2004 में ही इनकम टैक्स एक्ट में इसे [सेक्शन 56(2)] शामिल किया गया और यह परिभाषा तब लाई गई, जब कानून में IPC की धारा 377 मौजूद थी... इस्तेमाल किया गया शब्द [जीवनसाथी] संसद के इरादे के अनुसार है... टैक्स कानूनों की सख्त व्याख्या (Strict Interpretation) इसे न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से छूट नहीं देती है। हालांकि प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि 'जीवनसाथी' शब्द की व्याख्या में समलैंगिक जोड़ों को शामिल नहीं किया जा सकता है... यहां तक ​​कि धारा 377, जो एक दंडनीय कानून था, भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में थी; यह सोच कि सख्त व्याख्या किसी टैक्स कानून को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखती है, शुरुआत से ही गलत है। मैंने छह मामले दिए, जिनमें टैक्स कानूनों के प्रावधान - जिसमें चार्जिंग प्रावधान भी शामिल हैं - असंवैधानिक पाए गए।"

    सुप्रियो बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले का हवाला देते हुए, जिसमें कहा गया कि शादी करने या समलैंगिक रिश्तों को कानूनी मान्यता मिलने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, डॉ. संघवी ने तर्क दिया कि वह मामला मौजूदा चुनौती को रोकता नहीं है।

    उन्होंने कहा,

    “मौजूदा मामला सुप्रियो वाले मामले को फिर से नहीं उठा रहा है। हम इसका इस्तेमाल सिर्फ़ याचिकाकर्ताओं के दावों को मज़बूत करने के लिए कर रहे हैं।”

    साथ ही यह भी जोड़ा कि फ़ैसले को पूरी तरह से पढ़ा जाना चाहिए।

    उन्होंने आगे तर्क दिया कि शादी का जो अनुमान (Presumption of Marriage) उन विपरीत-लिंगी जोड़ों (Heterosexual Couples) को मिलता है, जो लंबे समय तक साथ रहते हैं और हमेशा पति-पत्नी की तरह रहने का इरादा दिखाते हैं, वही अनुमान समलैंगिक जोड़ों को भी मिलना चाहिए।

    वकील ने आगे कहा,

    “यहाँ मुख्य बात यह है कि एक विपरीत-लिंगी जोड़े को जीवनसाथी (Spouse) माने जाने के लिए, उन्हें उससे ज़्यादा कुछ करने की ज़रूरत नहीं है जो याचिकाकर्ता पहले ही कर चुके हैं। मैं बस यह कहना चाहता हूँ कि बिल्कुल वैसी ही परिस्थितियों में एक विपरीत-लिंगी जोड़ा [याचिकाकर्ताओं जैसा]… विपरीत-लिंगी जोड़े को जीवनसाथी माने जाने के लिए किसी और काम की ज़रूरत नहीं होती। शादी का अनुमान [हमेशा साथ रहने के] इरादे की जाँच से तय होता है, ठीक वैसे ही जैसे यह डोमिसाइल (निवास स्थान) के मामले में [किसी दूसरे संदर्भ में] लागू होता है। सुप्रियो मामले में भी सर्वसम्मति से इस तर्क को खारिज कर दिया गया था कि बच्चे पैदा करने का शादी से कोई लेना-देना है। यह शादी के लिए ज़रूरी चीज़ नहीं है, न तो बच्चे पैदा करने का काम और न ही उसका इरादा... बस इस बात का सबूत होना चाहिए कि वे हमेशा साथ रहना चाहते हैं।”

    उन्होंने टैक्स प्रावधान के कथित भेदभावपूर्ण असर को साबित करने के लिए सीधा तुलना करते हुए आगे कहा,

    “असंवैधानिक बात एक्ट में 'जीवनसाथी' (Spouse) शब्द का इस्तेमाल नहीं है। भेदभावपूर्ण बात भाषा का इस्तेमाल नहीं है… बल्कि इसका असर या भेदभाव असंवैधानिक है... हम किसी छूट वाले प्रावधान (Exemption Provision) की बात नहीं कर रहे हैं, हम आय को बाहर रखने (Exclusion of Income) की बात कर रहे हैं… हम कह रहे हैं कि हमें कानून का समान संरक्षण नहीं मिल रहा है… अगर याचिकाकर्ता विपरीत-लिंगी जोड़े होते, तो उन्हें शादीशुदा माना जाता और इनकम टैक्स एक्ट के तहत जीवनसाथी के तौर पर योग्य माना जाता। एकमात्र अंतर व्यक्तियों के लिंग का है।”

    वकील ने यह भी कहा कि अगर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फ़ैसला नहीं सुनाया, तो सभी समलैंगिक जोड़े वापस अंधेरे में चले जाएँगे और आर्थिक पारदर्शिता की कमी के कारण अपमानजनक ज़िंदगी जिएँगे।

    उन्होंने समझाया,

    “अगर यह छूट होती, तो हर किसी को इसे इनकम के तौर पर बताना पड़ता, जैसे सेक्शन 10 या 18 के तहत…लेकिन अगर किसी हेट्रोसेक्सुअल कपल (विपरीत लिंग वाले जोड़े) को कोई गिफ़्ट मिलता है, तो उन्हें इसकी जानकारी नहीं देनी पड़ती क्योंकि यह इनकम के दायरे में नहीं आता। एक टैक्स अफ़सर मेरा असेसमेंट करता है और कहता है कि मुझ पर टैक्स लगेगा…लेकिन जैसे ही मुझे अपना टैक्स रिटर्न फ़ाइल करना होता है और अपने पार्टनर से मिले गिफ़्ट के बारे में बताना होता है, तो ITR फ़ाइल करते समय मेरे साथ भेदभाव होता है।”

    उन्होंने प्रतिवादियों की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि याचिका को मंज़ूरी देने से टैक्स की चोरी हो सकती है; उन्होंने कहा कि गलत इस्तेमाल की संभावना के आधार पर किसी संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    संघवी ने कहा,

    “प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि टैक्स से बचा जा सकता है क्योंकि एक पुरुष दूसरे पुरुष को गिफ़्ट दे सकता है, जैसे कि सेम-सेक्स कपल (समलैंगिक जोड़ा) के मामले में होता है…लेकिन अलग-अलग सेक्सुअल ओरिएंटेशन और सेम-सेक्स रिश्तों को लेकर समाज में अब भी एक तरह का कलंक या भेदभाव है, मुझे नहीं लगता कि यह कोई मुद्दा बनेगा…लेकिन यह मुख्य बात नहीं है…अगर कोई इनकम टैक्स एक्ट का गलत इस्तेमाल करने पर ही आमादा है, तो वे शादी कर सकते हैं, टैक्स की चोरी कर सकते हैं और फिर आपसी सहमति से तलाक ले सकते हैं।”

    ASG अरविंद कामथ और SG तुषार मेहता ने पहले दलील दी थी कि टैक्स से जुड़े कानूनों की व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए, और सेम-सेक्स कपल के मामले में शादी का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। यह कहा गया कि चूंकि याचिकाकर्ता शादी के अधिकार का दावा नहीं कर सकते, इसलिए वे 'अन्य स्रोतों से आय' (Income from Other Sources) के प्रावधान के तहत मिलने वाले फ़ायदों का दावा भी नहीं कर सकते।

    Case Title : Anurag Kalia & Anr. v. Union of India & Anr.

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story