घरेलू हिंसा कानून के तहत बालिग अविवाहित बेटी पोस्ट-ग्रेजुएशन के लिए पढ़ाई का खर्च मांग सकती है: कर्नाटक हाईकोर्ट
Shahadat
21 July 2026 7:50 AM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि 'महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005' के तहत, पिता अपनी बालिग हो चुकी अविवाहित बेटी की पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए बाध्य है। कोर्ट ने माना कि बच्चे के बालिग होने पर माता-पिता की शिक्षा देने की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। [2026 LiveLaw (Kar) 258]
जस्टिस एच.पी. संदेश की सिंगल जज बेंच ने पिता की वह रिवीजन याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने ट्रायल कोर्ट और डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें उन्हें अपनी बेटी के एमडी डर्मेटोलॉजी कोर्स की फीस के तौर पर ₹16 लाख देने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने माना कि डीवी एक्ट की धारा 20 के तहत पढ़ाई का खर्च 'आर्थिक राहत' के तौर पर दिया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी आर्थिक मदद न देना एक्ट की धारा 3(d)(iv) के तहत "आर्थिक शोषण" माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा,
"...आर्थिक शोषण को परिभाषित करते हुए विधायिका ने उन सभी या किसी भी आर्थिक या वित्तीय संसाधनों से वंचित करने को भी इसमें शामिल किया है, जिनकी हकदार पीड़ित व्यक्ति किसी कानून या रीति-रिवाज के तहत है। दुनिया भर में यह रीति और परंपरा है कि माता-पिता स्वास्थ्य और शिक्षा सहित बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के लिए नैतिक रूप से बाध्य हैं। यदि याचिकाकर्ता की इस दलील को मान लिया जाए कि बालिग होने पर बच्चा भरण-पोषण या पढ़ाई के खर्च का हकदार नहीं है तो धारा 20(1)(d) में इस्तेमाल किया गया 'इसके अलावा' (in addition to) शब्द बेकार हो जाएगा..."
धारा 20(1) मजिस्ट्रेट को घरेलू हिंसा के कारण पीड़ित व्यक्ति और उसके बच्चों को हुए खर्च और नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक राहत देने का अधिकार देती है। क्लॉज (d) विशेष रूप से पीड़ित व्यक्ति और उसके बच्चों के भरण-पोषण का जिक्र करता है, जिसमें CrPC की धारा 125 या किसी अन्य कानून के तहत भरण-पोषण के आदेश के साथ या उसके अलावा दिया जाने वाला आदेश भी शामिल है।
प्रतिवादी बेटी ने NEET-PG परीक्षा पास करने के बाद मंगलुरु के फादर मुलर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च में एमडी डर्मेटोलॉजी प्रोग्राम में एडमिशन लिया। उसने बताया कि सीट पक्की करने की जल्दबाजी के कारण एडमिशन फीस भरने के लिए उसने अपने दादा से ₹14 लाख उधार लिए थे। ट्रायल कोर्ट ने पिता को निर्देश दिया कि वे बेटी की पढ़ाई के पहले साल के खर्च के तौर पर ₹16 लाख का भुगतान करें, और अपीलीय अदालत ने इस आदेश को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट के सामने पिता ने तर्क दिया कि उनकी बेटी बालिग हो चुकी है, उसे पोस्टग्रेजुएट कोर्स के दौरान स्टाइपेंड मिल रहा है, और इसलिए वह DV एक्ट के प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं कर सकती। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वह एक्ट की धारा 2(a) के तहत "पीड़ित व्यक्ति" की परिभाषा में नहीं आती है।
अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।
कुमारी भावना एन. बनाम श्री नागराजू एस. मामले में अपने पहले के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया:
"जैसे ही कोई बेटी बालिग होती है, वह महिला की परिभाषा में आ जाती है और अगर वह यह साबित कर दे कि उसके साथ घरेलू हिंसा हुई है तो वह पीड़ित व्यक्ति बन सकती है। जिस बेटी के लिए आर्थिक राहत की मांग की गई, बालिग होने पर वह ऐसी आर्थिक राहत पाने की हकदार होगी।"
अदालत ने नीलिमा चौरे बनाम विजय चौरे (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी सहारा लिया, जिसमें यह माना गया कि बेटी को अपने माता-पिता से पढ़ाई का खर्च मांगने का कानूनी अधिकार है और माता-पिता को उनके आर्थिक संसाधनों की सीमा के भीतर ज़रूरी पैसे देने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
इसके अलावा, अदालत ने जगदेसन बनाम तमिलनाडु राज्य (2015) मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का विस्तार से हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि बच्चे के बालिग होने पर शिक्षा प्रदान करने की पिता की कानूनी और नैतिक ज़िम्मेदारी खत्म नहीं होती है और ऐसी आर्थिक सहायता देने से इनकार करना डीवी एक्ट के तहत आर्थिक शोषण माना जा सकता है।
इन सिद्धांतों के आधार पर अदालत ने कहा:
"मद्रास हाईकोर्ट के फैसले में विस्तार से की गई चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि डीवी एक्ट की धारा 20 में गुजारा-भत्ता के अलावा आर्थिक राहत का प्रावधान है, और पिता को बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाना होगा, चाहे वह अंडरग्रेजुएट हो या पोस्टग्रेजुएट पढ़ाई। धारा 20(1) में 'लेकिन यहीं तक सीमित नहीं' और 'गुजारा-भत्ता के अलावा' जैसे शब्दों का व्यापक अर्थ और दायरा है, और मजिस्ट्रेट की शक्ति सीमित नहीं है।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पिता के फाइनेंशियल रिकॉर्ड से पता चलता है कि उनके पास खर्च उठाने की काफी क्षमता है। कोर्ट ने इस बात का ज़िक्र किया कि उन्होंने 2021 में ₹1.34 करोड़ से ज़्यादा की अचल संपत्ति (fixed assets) खरीदी थी और बाद के सालों में काफी लोन भी लिए थे, जो उनकी आर्थिक क्षमता को दिखाते हैं।
पिता की इस दलील को खारिज करते हुए कि बेटी बैंक लोन लेकर अपनी पढ़ाई का खर्च उठा सकती है, कोर्ट ने कहा:
"यह दलील कि बालिग होने के बाद वह बैंक लोन लेकर अपनी पढ़ाई जारी रख सकती है, ट्रायल कोर्ट और अपीलेट कोर्ट के आदेशों में दखल देने का आधार नहीं हो सकती। बेटी कोई कमाई नहीं कर रही है और अंडरग्रेजुएट से लेकर पोस्टग्रेजुएट लेवल तक लगातार पढ़ाई कर रही है।"
डीवी एक्ट की धारा 20 की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट की आर्थिक राहत देने की शक्ति केवल उस प्रावधान में साफ तौर पर बताई गई कैटेगरी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर शिक्षा का खर्च देने का आदेश देने तक भी फैली हुई है।
इसके अनुसार, हाई कोर्ट ने पिता की रिवीजन याचिका खारिज की और बेटी की पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा के लिए ₹16 लाख देने के आदेशों को बरकरार रखा।
Case Title: Vincent Correa v. Viyola Prathvi Correa


