ट्रांसजेंडर कानून संशोधन पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा

Praveen Mishra

15 April 2026 9:58 PM IST

  • ट्रांसजेंडर कानून संशोधन पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Act, 2026 को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि संशोधित कानून 'स्व-पहचान' (self-identification) के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान तय करने वाले व्यक्तियों को 'ट्रांसजेंडर' की कानूनी परिभाषा से बाहर कर देता है।

    मामले की सुनवाई जस्टिस सचिन शंकर मगदुम की एकल पीठ कर रही है। याचिकाकर्ताओं में दो ट्रांसवुमन शामिल हैं, जो लंबे समय से हार्मोन थेरेपी ले रही हैं और आधिकारिक दस्तावेजों में नाम व लिंग परिवर्तन की प्रक्रिया में हैं।

    सेवाओं से वंचित होने की आशंका

    याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि 2019 के मूल कानून की धारा 2(k) के तहत 'ट्रांसजेंडर' की परिभाषा से बाहर किए जाने पर उन्हें पासपोर्ट, चिकित्सा सेवाओं और अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाएगा।

    वरिष्ठ अधिवक्ता जयंना कोठारी ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील देते हुए कहा कि एक याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया है, जबकि दूसरी को नियमित चिकित्सा उपचार की आवश्यकता है, जो संशोधन के कारण प्रभावित हो सकता है। उन्होंने अंतरिम राहत की मांग करते हुए कहा कि फिलहाल उपचार जारी रखने की अनुमति दी जानी चाहिए।

    केंद्र का विरोध: 'सिर्फ आशंका'

    केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अरविंद कामथ ने अंतरिम राहत का विरोध करते हुए कहा कि अब तक किसी भी दस्तावेज (आधार, पैन आदि) को रद्द करने की कोई कार्रवाई नहीं हुई है और न ही किसी डॉक्टर द्वारा इलाज से इनकार का कोई प्रमाण है। उन्होंने तर्क दिया कि नुकसान केवल “आशंकात्मक” है, इसलिए बिना ठोस सबूत के अंतरिम राहत नहीं दी जानी चाहिए।

    संशोधन पर विवाद

    मूल Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 की धारा 2(k) के अनुसार, ट्रांसजेंडर व्यक्ति वह है जिसका लिंग जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाता, चाहे उसने सर्जरी या हार्मोन थेरेपी कराई हो या नहीं।

    हालांकि, 2026 के संशोधन में उन व्यक्तियों को बाहर कर दिया गया है जो बिना चिकित्सा हस्तक्षेप के केवल स्व-पहचान के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान निर्धारित करते हैं, जिसमें ट्रांससेक्सुअल और नॉन-बाइनरी व्यक्ति भी शामिल हैं।

    संवैधानिक चुनौती

    याचिकाओं में संशोधन को Article 14, Article 15(1), Article 16, Article 19 और Article 21 का उल्लंघन बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है।

    केंद्र ने अदालत को बताया कि इसी मुद्दे से जुड़ा मामला Lakhsmi Tripathi v. Union of India & Ors. में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी आने की संभावना है।

    अदालत ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 17 अप्रैल को तय की है।

    Next Story