आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर पत्नी पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट ने ₹20,000 मेंटेनेंस का आदेश रद्द किया
Praveen Mishra
5 Nov 2026 6:35 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता (Maintenance) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि पत्नी अच्छी तरह शिक्षित है, अच्छी नौकरी कर रही है और अपनी आय से खुद का भरण-पोषण करने में सक्षम है, तो उसे पति पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं माना जा सकता।
जस्टिस डॉ. चिल्लाकुर सुमलता की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए फैमिली कोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पति को अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने 20,000 रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने कहा, “जब पत्नी अच्छी तरह शिक्षित हो, अच्छी नौकरी में हो और इतनी आय अर्जित कर रही हो कि अपना भरण-पोषण कर सके, तो उसे अपने पति पर निर्भर नहीं माना जा सकता।”
क्या था मामला?
पति ने 4 जुलाई 2025 को फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने पत्नी की भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 144 के तहत दाखिल मेंटेनेंस याचिका स्वीकार करते हुए पति को हर महीने 20,000 रुपये देने का निर्देश दिया था।
फैमिली कोर्ट ने माना था कि पत्नी नौकरी करती है और हर महीने 54,700 रुपये कमाती है। हालांकि, पति की आय पत्नी से अधिक होने के कारण उसे पत्नी का भरण-पोषण करना चाहिए।
पति, जो पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उसकी पत्नी कंप्यूटर साइंस में बीई ग्रेजुएट है और एक निजी कंपनी में काम करती है। उसकी सालाना आय लगभग 10 लाख रुपये है।
पति ने यह भी बताया कि वह लंबे समय से टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित है और उसे दिन में चार बार इंसुलिन लेना पड़ता है। उसकी मासिक आय लगभग 2 लाख रुपये है, लेकिन इसमें से करीब 70,000 रुपये वह अपने और माता-पिता के इलाज तथा पत्नी द्वारा दर्ज कराए गए मामलों में कानूनी खर्चों पर खर्च करता है।
दूसरी ओर, पत्नी ने दलील दी कि शादी से पहले पति ने अपनी मेडिकल स्थिति की जानकारी नहीं दी थी। उसने पति पर दहेज की मांग करने, उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप भी लगाए।
गुजारा भत्ता पाने के लिए खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ होना जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 144 के तहत मेंटेनेंस का दावा करने के लिए केवल यह साबित करना पर्याप्त नहीं है कि दूसरे पक्ष ने भरण-पोषण करने से इनकार किया है या उपेक्षा की है। यह भी स्थापित करना होगा कि मेंटेनेंस मांगने वाला व्यक्ति खुद अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है।
कोर्ट ने कहा कि इसके बाद ही पति की आर्थिक स्थिति और अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने की उसकी क्षमता पर विचार किया जा सकता है।
पीठ ने यह भी गौर किया कि पत्नी के अपने अनुसार, उसके माता-पिता उस पर निर्भर हैं और वह उनके भरण-पोषण पर हर महीने 35,000 रुपये खर्च करती है।
इस पर कोर्ट ने कहा, “जब पत्नी खुद यह कहती है कि उसके माता-पिता उस पर निर्भर हैं और वह उनके भरण-पोषण पर हर महीने 35,000 रुपये खर्च करती है, तो उसकी इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह अपने पति पर निर्भर है और इसलिए पति को उसका भरण-पोषण करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थता, मेंटेनेंस का दावा करने की एक आवश्यक शर्त है। कानून यह नहीं कहता कि हर परिस्थिति में एक विवाहित महिला का भरण-पोषण उसके पति द्वारा ही किया जाना चाहिए।
पति की आय अधिक होना ही मेंटेनेंस का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में भले ही पति की आय पत्नी से अधिक है, लेकिन पत्नी अपनी कमाई से अपने माता-पिता का भरण-पोषण भी कर रही है। इसलिए उसे पति पर निर्भर नहीं माना जा सकता।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार कर ली और फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को हर महीने 20,000 रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश रद्द कर दिया।

