रिश्वत की मांग और स्वीकारोक्ति के बिना भ्रष्टाचार का मामला नहीं बनता: कर्नाटक हाइकोर्ट ने दोहराया सिद्धांत

Amir Ahmad

24 Feb 2026 12:49 PM IST

  • रिश्वत की मांग और स्वीकारोक्ति के बिना भ्रष्टाचार का मामला नहीं बनता: कर्नाटक हाइकोर्ट ने दोहराया सिद्धांत

    कर्नाटक हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि किसी लोक सेवक के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत मामला तभी बनता है, जब रिश्वत की मांग और स्वीकारोक्ति दोनों के ठोस प्रमाण हों। केवल मांग या केवल स्वीकारोक्ति के आधार पर अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने कहा कि धारा 7 का मूल तत्व ही मांग और स्वीकार है।

    उन्होंने कहा,

    " सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के समेकित अध्ययन से स्पष्ट है कि धारा 7 की आत्मा मांग और स्वीकारोक्ति है। यदि मांग है पर स्वीकार नहीं तो अपराध नहीं बनता। यदि स्वीकार है पर मांग नहीं, तब भी अपराध नहीं बनता। धारा 7 के तहत आरोप तभी टिकेगा जब मांग और स्वीकार दोनों हों और वह किसी सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन या उससे विरत रहने से जुड़ा हो।”

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिस लोक सेवक पर आरोप लगाया गया, उसके पास उस समय संबंधित कार्य लंबित होना चाहिए, जिसके बदले रिश्वत की मांग की गई हो।

    यह टिप्पणी उस मामले में आई जिसमें एक पुलिस उपनिरीक्षक के विरुद्ध FIR दर्ज की गई।

    आरोप था कि उन्होंने एक मामले को बंद करने के लिए शिकायतकर्ता से एक लाख रुपये की मांग की थी।

    शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त पुलिस में आरोप लगाया था कि उपनिरीक्षक ने बी रिपोर्ट दाखिल करने के लिए एक लाख रुपये मांगे और यह राशि एक अन्य व्यक्ति के माध्यम से साझा की जानी थी।

    इस आधार पर तत्कालीन भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने प्राथमिकी दर्ज की थी। जांच के दौरान आरोपी उपनिरीक्षक ने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और FIR रद्द करने की मांग की।

    अदालत ने पाया कि मामले में न तो कोई जाल बिछाया गया था न कोई पूर्व-जांच पंचनामा तैयार हुआ, न ही आरोपी के पास से कोई धन बरामद हुआ।

    अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया भी मांग और स्वीकारोक्ति का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच किसी प्रकार की बातचीत का भी कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।

    साथ ही आरोपी ने अभिलेखों के माध्यम से यह भी दर्शाया कि कथित घटना के दिन वह बेंगलुरु में उपस्थित ही नहीं थे।

    जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा,

    “यह स्वीकार किया गया तथ्य है कि न कोई जाल बिछाया गया और न ही मांग तथा स्वीकारोक्ति का कोई प्रथम दृष्टया निष्कर्ष सामने आया। याचिकाकर्ता के पास से कोई संदिग्ध धन बरामद नहीं हुआ। ऐसे में अपराध पंजीकरण के छह वर्ष बाद भी जांच जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है जबकि जांच को आगे बढ़ाने के लिए एक दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं है।”

    अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पूर्व में दिए गए निर्णयों, जिनमें संशोधन से पहले और बाद की धारा 7 की व्याख्या शामिल है के अनुसार मांग और स्वीकारोक्ति का प्रमाण अनिवार्य है।

    अदालत ने कहा कि शिकायत परिस्थितियों से प्रतिशोध की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है।

    इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कर्नाटक हाइकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए उपनिरीक्षक के विरुद्ध दर्ज FIR रद्द की।

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