SIR में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के आरोप: BJP नेता रवि पाटिल के खिलाफ FIR की जांच पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने लगाई रोक

  • SIR में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के आरोप: BJP नेता रवि पाटिल के खिलाफ FIR की जांच पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने लगाई रोक

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार (13 अक्टूबर) को भाजपा नेता डॉ. रवि बसालिंगप्पागौड़ा पाटिल और अन्य के खिलाफ दर्ज FIR में आगे की जांच पर रोक लगा दी। यह मामला मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान कथित तौर पर थोक में फॉर्म नंबर 7 के जरिए मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के आरोपों से जुड़ा है।

    जस्टिस वेंकटेश नाइक टी ने धारवाड़ में सुनवाई करते हुए कहा कि समान तथ्यों वाले एक अन्य मामले में समन्वय पीठ द्वारा दिए गए आदेश को देखते हुए, अगली सुनवाई तक जांच पर रोक लगाना न्यायिक अनुशासन बनाए रखने के लिहाज से उचित है।

    मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को होगी।

    भाजपा नेता की ओर से क्या दलील दी गई?

    रवि पाटिल की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अरुणा श्याम ने दलील दी कि FIR राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की साजिश का परिणाम है। उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा समानांतर जांच किया जाना कानून के तहत स्वीकार्य नहीं है।

    उन्होंने यह भी दलील दी कि चुनाव आयोग ने थोक में फॉर्म नंबर 7 के जरिए आपत्तियां दाखिल करने की अनुमति देने संबंधी अधिसूचना जारी की थी। इन आवेदनों पर निर्णय लेने का अधिकार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को है।

    उनके अनुसार, पहले निर्वाचन अधिकारी को आवेदनों पर निर्णय लेना चाहिए और यदि उसके बाद भी कोई संदेह बना रहता है, तभी जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

    सीनियर एडवोकेट ने यह भी बताया कि राज्य के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह की FIR दर्ज की गई हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्तर पर आपराधिक कार्यवाही समय से पहले शुरू की गई है।

    समान मामले में हाईकोर्ट पहले भी लगा चुका है रोक

    अदालत को बताया गया कि बेंगलुरु में बैठी समन्वय पीठ ने पिछले सप्ताह W.P. No. 31887 of 2026 और W.P. No. 31893 of 2026 में इसी तरह के मामले पर विचार किया था।

    इन याचिकाओं को भाजपा बूथ लेवल एजेंट जी.एस. वसंतलक्ष्मी और दीपक सिंह आर. ने दाखिल किया था।

    उस मामले में जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की थी कि शिकायत समय से पहले की गई प्रतीत होती है, क्योंकि सक्षम निर्वाचन प्राधिकारी ने फॉर्म नंबर 7 के आवेदनों पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया था। अदालत ने वहां भी जांच पर रोक लगा दी थी।

    वर्तमान मामले में जस्टिस वेंकटेश नाइक टी ने कहा कि दोनों मामलों के तथ्य और पहले दिए गए आदेश का उद्देश्य समान हैं।

    अदालत ने कहा:

    “न्यायिक अनुशासन बनाए रखने के मद्देनजर, अगली सुनवाई तक जांच पर रोक लगाना उचित है। आवश्यकता होने पर राज्य सरकार आदेश में संशोधन के लिए आवेदन दाखिल कर सकती है।”

    क्या हैं आरोप?

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, कांग्रेस पार्टी के एक ब्लॉक एजेंट ने शिकायत दर्ज कराई थी कि रवि पाटिल सहित आरोपियों ने एक विशेष समुदाय के मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने की योजना बनाई।

    शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने बेलगावी महानगर पालिका के निर्वाचन अनुभाग से जुड़े बूथ लेवल अधिकारी के समक्ष लगभग 198 कथित फर्जी फॉर्म नंबर 7 आवेदन दाखिल किए।

    शिकायतकर्ता का आरोप था कि सूची में शामिल 198 मतदाता अपने दर्ज पते पर ही रह रहे थे, फिर भी उनके नाम हटाने के उद्देश्य से आवेदन दिए गए। आरोप था कि इन आवेदनों के जरिए मुस्लिम मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर करने का प्रयास किया गया।

    शिकायत के आधार पर बेलगावी के मार्केट पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(1) के तहत नोटिस जारी किया गया।

    रवि पाटिल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप दर्ज किए गए हैं।

    पहले सत्र न्यायालय से मिल चुकी है अग्रिम जमानत

    इससे पहले बेलगावी की सत्र अदालत ने इसी FIR के संबंध में रवि पाटिल को अग्रिम जमानत दी थी।

    सत्र अदालत ने उस समय टिप्पणी की थी कि केवल फॉर्म नंबर 7 दाखिल करने से अपने आप कार्रवाई शुरू नहीं हो जाती, क्योंकि निर्वाचन अधिकारी आवेदनों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन करते हैं।

    अब कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी समान मामले में पहले दिए गए आदेश का हवाला देते हुए जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है।

    हाईकोर्ट का यह आदेश जांच पर अगली सुनवाई तक रोक लगाने से संबंधित है। इसे आरोपों के सही या गलत होने पर अंतिम निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को होगी।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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