अंतरिम गुजारा भत्ता के अलावा बच्चे की स्कूल फीस देने की जिम्मेदारी पिता की, विशेष रूप से जब पत्नी बेरोजगार हो: कर्नाटक हाईकोर्ट

Praveen Mishra

27 Aug 2024 6:28 PM IST

  • अंतरिम गुजारा भत्ता के अलावा बच्चे की स्कूल फीस देने की जिम्मेदारी पिता की, विशेष रूप से जब पत्नी बेरोजगार हो: कर्नाटक हाईकोर्ट

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि एक पिता द्वारा बच्चे की स्कूल फीस का भुगतान करने का मतलब यह नहीं होगा कि वह बच्चे को गुजारा भत्ता राशि नहीं देगा क्योंकि वह अपनी मां के साथ अलग रहता है।

    जस्टिस एम नागप्रसन्ना की सिंगल जज बेंच ने एक पति द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उसे पत्नी और बच्चे को अंतरिम रखरखाव के रूप में 5,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

    पति ने दावा किया कि वह प्रति माह 30,000 रुपये कमा रहा है और एक निजी शैक्षणिक संस्थान में सहायक प्रोफेसर के रूप में काम करता है और पत्नी और बच्चे को 5,000 रुपये का भुगतान उस पर भारी पड़ेगा। याचिकाकर्ता द्वारा वर्ष 2022 से बच्चे की पूरी स्कूल फीस का भुगतान किया जा रहा है। चूंकि पत्नी नौकरीपेशा है, इसलिए पत्नी को गुजारा भत्ता मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    पत्नी ने यह कहते हुए याचिका का विरोध किया कि याचिकाकर्ता के आग्रह पर बच्चे के जन्म के बाद उसने नौकरी छोड़ दी है। जो राशि का आदेश दिया गया है वह इतनी अधिक नहीं है कि याचिकाकर्ता भुगतान नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने पति के आग्रह पर पत्नी द्वारा बच्चे की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ दिए जाने पर विचार करते हुए कहा, "यह पति का कर्तव्य है कि वह पत्नी और बच्चे का भरण-पोषण करे और भरण-पोषण की जिम्मेदारी से अपने हाथ न धोए।"

    खंडपीठ ने कहा, ''फीस भरने का यह मतलब नहीं है कि पति बच्चे के लिए, जीने के लिए गुजारा भत्ता नहीं देगा। फीस का भुगतान एक बच्चे और पत्नी के भरण-पोषण के लिए पति द्वारा भरण-पोषण के अलावा सभी अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं।"

    यह देखते हुए कि पति पर आज की तारीख में 3,70,000 रुपये का बकाया है, कोर्ट ने कहा, "इन सभी कारकों पर याचिकाकर्ता-पति की याचिका पर विचार करने का सवाल ही नहीं उठता है, जो रखरखाव के भुगतान में घोर चूक में है।"

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

    Next Story