शराब घोटाला मामला: अंतरिम जमानत पर रहते हुए नियमित जमानत याचिका सुनवाई योग्य नहीं, आरोपी का 'हिरासत' में होना अनिवार्य : झारखंड हाइकोर्ट
Amir Ahmad
4 Feb 2026 1:31 PM IST

झारखंड हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस व्यक्ति को अंतरिम जमानत मिली हुई है, उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 483 के अंतर्गत नियमित जमानत के लिए हिरासत में माना नहीं जा सकता, जब तक कि वह वास्तव में न्यायिक हिरासत में न हो या अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण न करे।
हाइकोर्ट ने कहा कि नियमित जमानत की याचिका केवल उसी स्थिति में सुनवाई योग्य होती है, जब आरोपी विधिवत हिरासत में हो।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ एक आरोपी द्वारा दायर नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के एक मामले से संबंधित थी। यह मामला 20 मई, 2025 को दर्ज FIR से जुड़ा था, जिसमें आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात सहित कई गंभीर धाराओं तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता को 7 जनवरी, 2026 को गोवा से गिरफ्तार किया गया और 8 जनवरी, 2026 को गोवा के सेशंस जज के समक्ष पेश किया गया। ट्रांजिट रिमांड पर विचार करते हुए सेशंस कोर्ट ने उसी दिन उसे चार दिनों की अंतरिम जमानत प्रदान की थी, जो 12 जनवरी, 2026 तक प्रभावी थी। अंतरिम जमानत इस शर्त पर दी गई कि आरोपी जांच अधिकारी के समक्ष आत्मसमर्पण करेगा और उसके बाद उसे पुलिस हिरासत में लिया जाएगा।
हालांकि, बाद में यह दर्ज किया गया कि याचिकाकर्ता ने अंतरिम जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया और न तो आत्मसमर्पण किया और न ही संबंधित अदालत के समक्ष उपस्थित हुआ।
नियमित जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान कार्यालय आपत्ति सामने आई कि याचिकाकर्ता का वकालतनामा जेल अधीक्षक की मुहर के बिना दाखिल किया गया। इस पर याचिकाकर्ता ने दलील दी कि अंतरिम जमानत मिलने के बाद वह अदालत की “संरचनात्मक हिरासत” में माना जाना चाहिए, इसलिए उसकी नियमित जमानत याचिका पर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई की जानी चाहिए।
राज्य सरकार ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि BNSS की धारा 483 के तहत जमानत याचिका तभी सुनवाई योग्य होती है, जब आरोपी वास्तव में हिरासत में हो। केवल अंतरिम जमानत पर होना हिरासत की श्रेणी में नहीं आता, विशेषकर तब जब आरोपी ने जमानत की शर्तों का पालन ही न किया हो।
हाइकोर्ट ने कहा कि अंतरिम जमानत मिलने के बाद भी याचिकाकर्ता ने न तो झारखंड की सक्षम अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण किया और न ही अंतरिम जमानत के निर्देशों का पालन किया। ऐसी स्थिति में बिना हिरासत में आए सीधे नियमित जमानत याचिका दाखिल करना विधि प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिरासत का अर्थ तब होता है, जब पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे और उसे न्यायिक या अन्य हिरासत में भेजा जाए या जब व्यक्ति स्वयं अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण कर उसके निर्देशों के अधीन हो जाए। यदि जमानत पर मुक्त व्यक्ति को ही हिरासत में मान लिया जाए, तो यह न्याय व्यवस्था का उपहास होगा।
हाइकोर्ट ने कहा कि जमानत की अवधारणा स्वयं हिरासत की पूर्वधारणा पर आधारित है और जमानत केवल उसी स्थिति में दी जा सकती है जब व्यक्ति निरुद्ध हो।
हाइकोर्ट ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के एक निर्णय से स्वयं को अलग करते हुए कहा कि उस मामले में बाध्यकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर विचार नहीं किया गया।
हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि नियमित जमानत के लिए वास्तविक हिरासत आवश्यक है।
याचिकाकर्ता ने यह भी अनुरोध किया कि उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति दी जाए। इस पर हाइकोर्ट ने झारखंड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025 का हवाला देते हुए कहा कि प्रथम पेशी के लिए आरोपी की भौतिक उपस्थिति अनिवार्य है और वर्चुअल उपस्थिति की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने कार्यालय आपत्ति को सही ठहराया और कहा कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता द्वारा दायर नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया।

