मध्यस्थता में समझौते पर हस्ताक्षर के बाद महज मन बदलने पर सहमति वापस नहीं ले सकता पक्ष: झारखंड हाईकोर्ट
Amir Ahmad
8 Aug 2026 12:52 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत से जुड़ी मध्यस्थता प्रक्रिया के दौरान यदि पक्षकारों के बीच लिखित समझौता हो जाता है और दोनों उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो बाद में केवल मन बदल जाने के आधार पर कोई एक पक्ष अपनी सहमति से पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति वापस लेने का अधिकार मध्यस्थता की प्रक्रिया चलने तक ही रहता है। समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद वह बाध्यकारी हो जाता है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने पति की ओर से दायर अपील पर यह फैसला सुनाया। पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग की थी, जिसे पारिवारिक अदालत ने खारिज किया।
पति का आरोप था कि विवाह के बाद पत्नी उस पर अपने मायके के बजाय उसके घर में स्थायी रूप से रहने के लिए दबाव डालती थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उसके और उसके माता-पिता के साथ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करती थी तथा झूठे दहेज के मामलों में उसे और उसके परिवार को फंसाने की धमकी देती थी।
फैमिली कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की। अपील लंबित रहने के दौरान मामले को हाईकोर्ट के विशेष मध्यस्थता अभियान "मेडिएशन फॉर द नेशन" में भेजा गया।
मध्यस्थता सफल रही और पति-पत्नी ने लिखित समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। दोनों ने हाईकोर्ट के समक्ष संयुक्त समझौता याचिका भी दाखिल की। हालांकि, अपील का निपटारा समझौते के आधार पर होने से पहले पत्नी ने अदालत को बताया कि अब वह उस समझौते के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहती, जबकि वह पहले ही समझौते पर हस्ताक्षर कर चुकी थी।
इसके बाद हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या अदालत से जुड़ी मध्यस्थता के जरिए हुए समझौते और उसके बाद अदालत में दाखिल संयुक्त समझौता याचिका से कोई पक्ष एकतरफा तरीके से पीछे हट सकता है।
हाईकोर्ट ने इसका जवाब नकारात्मक देते हुए कहा कि अदालत से जुड़ी मध्यस्थता में स्वेच्छा से किया गया समझौता पक्षकारों के हस्ताक्षर के बाद कानूनी मान्यता प्राप्त कर लेता है। अदालत ने मध्यस्थता अधिनियम, 2023 का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसा समझौता उसी तरह लागू किया जा सकता है जैसे किसी अदालत का फैसला या डिक्री।
सुप्रीम कोर्ट के पेरी कंसागरा बनाम स्मृति मदान कंसागरा मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता की कार्यवाही के दौरान पक्षकार अपनी सहमति वापस लेने के लिए स्वतंत्र होता है, लेकिन जब मध्यस्थता सफलतापूर्वक पूरी हो जाए और दोनों पक्ष तथा उनके अधिवक्ता औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दें, तो एकतरफा रूप से उससे पीछे हटने का विकल्प समाप्त हो जाता है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई पक्ष समझौते के तहत मिलने वाले लाभ को स्वीकार कर लेता है या उसके आधार पर कोई कदम उठा लेता है तो बाद में उस समझौते से इनकार करने या उसे वापस लेने से उसे वचनबद्धता के सिद्धांत के कारण रोका जा सकता है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया,
"बाद में केवल मन बदल जाने या पछतावे के कारण कोई भी पक्ष समझौते से पीछे नहीं हट सकता।"
इस आधार पर हाईकोर्ट ने समझौते को बाध्यकारी माना और पति-पत्नी दोनों को 19 अगस्त 2025 को हुए मध्यस्थता समझौते की शर्तों का पालन करने का निर्देश दिया। इसमें समझौते में दर्ज शर्तों के अनुसार विवाह समाप्त करने पर दोनों की सहमति भी शामिल थी।


