FIR दर्ज नहीं कराना पत्नी के साथ हुई क्रूरता की गवाही खारिज करने का आधार नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

  • FIR दर्ज नहीं कराना पत्नी के साथ हुई क्रूरता की गवाही खारिज करने का आधार नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद में केवल इस आधार पर पत्नी की गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता कि उसने पति के खिलाफ मारपीट और क्रूरता के आरोपों को लेकर FIR दर्ज नहीं कराई। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक मामलों में क्रूरता के आरोपों का आकलन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

    जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ पत्नी की ओर से दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील फैमिली कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई, जिसमें विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 27(1)(बी) और (डी) के तहत दाखिल तलाक की याचिका खारिज कर दी गई। अपील फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 19(1) के तहत दाखिल की गई।

    मामले के अनुसार दंपती का विवाह 20 अक्टूबर 2010 को जमशेदपुर के विवाह अधिकारी के समक्ष हुआ था। उनके दो बच्चे हैं। पत्नी ने आरोप लगाया कि बेटे के जन्म के बाद पति शराब पीने लगा और उसके साथ मारपीट तथा गाली-गलौज करने लगा। वर्ष 2015 में ससुर की मृत्यु के बाद पति का व्यवहार और हिंसक हो गया। पत्नी के मुताबिक, पति ने काम करना भी बंद कर दिया और परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाई।

    पत्नी ने अदालत को बताया कि 15 मार्च 2018 को उसे दोनों बच्चों के साथ वैवाहिक घर से निकाल दिया गया। इसके बाद वह अपने माता-पिता के पास रहने लगी और निजी नौकरी करके अपना तथा बच्चों का खर्च उठाने लगी।

    पति को नोटिस तामील होने के बावजूद उसके पेश नहीं होने पर फैमिली कोर्ट ने एकतरफा कार्यवाही की। हालांकि अदालत ने पत्नी की तलाक याचिका खारिज कर दी। इसके बाद पत्नी ने हाईकोर्ट का रुख किया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने मुख्य रूप से इस आधार पर क्रूरता के आरोपों को स्वीकार नहीं किया कि कथित मारपीट और प्रताड़ना के संबंध में कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं कराया गया। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में केवल FIR दर्ज नहीं होने के आधार पर क्रूरता के संबंध में दिए गए बयान को खारिज नहीं किया जा सकता।

    खंडपीठ ने गौर किया कि पत्नी ने स्पष्ट रूप से बयान दिया कि पति शराब के नशे में उसके साथ मारपीट करता था और पैसों के लिए उसे प्रताड़ित करता था। उसने यह भी बताया था कि दोनों बच्चों को भी इस तरह के व्यवहार का सामना करना पड़ता था।

    अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि कोई पत्नी स्वेच्छा से अपने पति से अलग रहकर कठिनाइयां क्यों झेलेगी और अकेले अपने तथा बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी क्यों उठाएगी। पीठ के अनुसार, परिस्थितियां पत्नी के बयान को विश्वसनीयता प्रदान करती हैं। अदालत ने कहा कि FIR दर्ज नहीं कराने के बावजूद पत्नी ने पति की ओर से की गई मारपीट और प्रताड़ना के बारे में विस्तार से बताया।

    हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन करने में विफल रहा और क्रूरता के आरोपों पर उसका निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण था।

    वैवाहिक घर छोड़ने के मुद्दे पर भी हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के जाने को पति का स्वेच्छा से परित्याग करना नहीं माना जा सकता। यदि पत्नी को क्रूरता का सामना करना पड़ा और परिस्थितियों ने उसे घर छोड़ने के लिए मजबूर किया, तो इसे अपनी इच्छा से वैवाहिक संबंध छोड़ना नहीं कहा जा सकता। अदालत ने माना कि क्रूरता और परित्याग के पहलू एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं और क्रूरता के कारण घर छोड़ने वाली पत्नी पर स्वेच्छा से परित्याग करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 9 फरवरी 2026 के फैसले और 16 फरवरी 2026 की डिक्री रद्द की।

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