पति की स्वेच्छा से लिए गए कर्ज से पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी कम नहीं होगी: झारखंड हाईकोर्ट
Amir Ahmad
12 Aug 2026 1:23 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि पति द्वारा भविष्य में संपत्ति बनाने के उद्देश्य से लिया गया स्वैच्छिक कर्ज सामान्यतः पत्नी के भरण-पोषण या स्थायी गुजारा भत्ते की जिम्मेदारी को कम करने का आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति निर्माण के लिए लिए गए कर्ज की किस्तों को पति की आय से केवल इस आधार पर घटाकर नहीं देखा जा सकता कि इससे उसकी उपलब्ध आय कम हो गई ।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक वैवाहिक अपील पर सुनवाई करते हुए की। पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा उसकी तलाक की याचिका खारिज किए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की थी। गढ़वा की फैमिली कोर्ट ने फरवरी 2025 में यह कहते हुए उसकी याचिका खारिज की थी कि वह पत्नी द्वारा की गई कथित क्रूरता को साबित करने में विफल रहा।
अपील की सुनवाई के दौरान पति और पत्नी दोनों ने शुरुआत में साथ रहने की इच्छा जताई। इसके बाद हाईकोर्ट ने दोनों को मध्यस्थता के लिए भेजा, लेकिन प्रयास सफल नहीं हुआ।
बाद में पति ने एकमुश्त समझौते के रूप में 40 लाख रुपये देने की पेशकश की। उसने अपने बेटे के नौकरी हासिल करने तक उसकी शिक्षा का खर्च और बेटी की शादी का खर्च उठाने की भी पेशकश की। हालांकि, पत्नी ने यह राशि अपर्याप्त बताते हुए प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने स्थायी गुजारा भत्ते के मुद्दे पर विचार किया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले 'राजनेश बनाम नेहा' के अनुसार दोनों पक्षों से आय और संपत्ति से संबंधित हलफनामे मांगे।
पति गढ़वा के सदर अस्पताल में संविदा पर डॉक्टर के रूप में कार्यरत था। उसने अपनी सकल मासिक आय 1,61,260 रुपये बताई।
उसका कहना था कि कर्ज की किस्तों के रूप में हर महीने 1,28,252 रुपये की राशि कट रही है, इसलिए गुजारा भत्ता तय करते समय उसकी वास्तविक उपलब्ध आय को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पति की पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सर्वोपरि है और भविष्य में संपत्ति बनाने के लिए स्वेच्छा से लिए गए कर्ज को सामान्यतः इस जिम्मेदारी को कम करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि किसी कर्ज की किस्त को आय से घटाने की अनुमति देने से पहले अदालत को कर्ज की प्रकृति और उसके उद्देश्य की जांच करनी होगी। यदि कर्ज इस उद्देश्य से लिया गया कि उपलब्ध आय कम दिखाई दे और इस तरह भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचा जा सके, तो अदालत उस कटौती को नजरअंदाज कर सकती है।
इसी तरह यदि कर्ज अनुमानित भविष्य में संपत्ति बनाने या ऐसे निवेश के लिए लिया गया है जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ पत्नी या बच्चों को नहीं मिलता, तो उसकी किस्तों को भी पति की आय में कमी के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि अदालत केवल पति की स्वैच्छिक कटौतियों के बाद बची रकम को नहीं देख सकती बल्कि उसकी वास्तविक कमाई की क्षमता पर भी विचार कर सकती है। संपत्ति बनाने के लिए लिया गया कर्ज पूंजीगत निवेश की प्रकृति का हो सकता है और इसे आवश्यक या अपरिहार्य खर्चों की तरह नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने पत्नी और बच्चों की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। पत्नी की उम्र 40 वर्ष थी और उसके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं था। उनका बेटा 14 वर्ष और बेटी 12 वर्ष की थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने परिवार के लिए कुल 90 लाख रुपये का एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता और वित्तीय प्रावधान तय किया। इसमें 40 लाख रुपये पत्नी को तथा 25-25 लाख रुपये बेटे और बेटी के लिए निर्धारित किए गए।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह राशि पत्नी के भविष्य के भरण-पोषण तथा बच्चों की आजीविका और शिक्षा की जरूरतों को देखते हुए “न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत” है।


