पत्नी की सिर्फ यह इच्छा कि पति घरजमाई बनकर रहे, क्रूरता नहीं: झारखंड हाईकोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज की

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    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी की केवल यह इच्छा कि उसका पति उसके मायके में घरजमाई बनकर रहे, हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक मांगने के लिए वैवाहिक क्रूरता नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने पति की तलाक की याचिका खारिज करने का फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए उसकी अपील भी खारिज की।

    जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ पति की ओर से दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) (AI) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने खारिज किया था।

    पति-पत्नी की शादी 21 नवंबर 2008 को पटना में हुई थी। दोनों की 11 साल की एक बेटी भी है। पति के अनुसार, शादी के शुरुआती दिनों में दोनों उसके पैतृक घर में शांतिपूर्वक रह रहे थे। बाद में पत्नी अक्सर अपने मायके पटना जाने लगी। पति का आरोप था कि पत्नी के माता-पिता चाहते थे कि वह अपने बुजुर्ग और बीमार माता-पिता को छोड़कर पटना आकर उनके साथ घरजमाई के रूप में रहे।

    पति ने दावा किया कि पत्नी 24 फरवरी 2013 को पटना चली गई और इसके बाद वैवाहिक घर वापस नहीं लौटी। उसका आरोप है कि पत्नी उस पर पटना जाकर घरजमाई के रूप में रहने के लिए दबाव डालती थी। पति ने बताया कि उसने ऐसा करने से इनकार किया, क्योंकि उसके बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने वाला कोई और नहीं है।

    पति ने पत्नी के बार-बार मायके जाने को भी अपने साथ की गई क्रूरता का एक आधार बताया। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और क्रूरता के आधार पर तलाक देने से इनकार किया।

    फैमिली कोर्ट ने कहा था कि किसी विवाहित महिला का अपने मायके जाना उसका अधिकार है और केवल मायके आने-जाने की वजह से इसे तलाक के लिए वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।

    हाईकोर्ट के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने वैवाहिक कानून में क्रूरता से जुड़े स्थापित सिद्धांतों पर विचार किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. एन.जी. दास्ताने बनाम श्रीमती एस. दास्ताने के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जिस आचरण को क्रूरता बताया जा रहा है, वह ऐसा होना चाहिए, जिससे यह उचित आशंका पैदा हो कि दूसरे जीवनसाथी के साथ रहना उसके लिए नुकसानदायक या हानिकारक होगा।

    हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता पर्याप्त रूप से गंभीर और महत्वपूर्ण होनी चाहिए। यह वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य उतार-चढ़ाव और छोटी-मोटी बातों से अधिक गंभीर होनी चाहिए। केवल मामूली घटनाएं, स्वभाव में अंतर या आपसी असंगति सामान्य तौर पर वैवाहिक क्रूरता का आधार नहीं बन सकती।

    घरजमाई बनाए जाने के आरोप पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्ष से सहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि समाज में घरजमाई की प्रथा काफी पुरानी है, लेकिन किसी पुरुष का घरजमाई बनकर रहना उसकी अपनी पसंद का विषय है। मामले में ऐसा कोई तथ्य नहीं था कि पति को जबरन या मजबूर करके घरजमाई के रूप में रहने के लिए कहा गया हो।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी की केवल यह इच्छा कि पति घरजमाई बनकर रहे हिंदू विवाह के तहत क्रूरता नहीं मानी जा सकती।

    हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि पत्नी का बार-बार अपने मायके जाना वैवाहिक क्रूरता है। कोर्ट ने कहा कि मामले की परिस्थितियों में पत्नी का मायके जाना विवाह समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता।

    खंडपीठ ने कहा कि पति कथित क्रूरता के आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों से साबित करने में विफल रहा है। कोर्ट को फैमिली कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के आकलन में कोई ऐसी गलती या विकृति नहीं मिली, जिसके आधार पर उसके फैसले में हस्तक्षेप किया जाए।

    इस आधार पर झारखंड हाईकोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज करने वाला फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा और पति की अपील भी खारिज की।

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