कानून की गलत व्याख्या मात्र से अर्ध-न्यायिक अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई नहीं हो सकती: झारखंड हाईकोर्ट
Amir Ahmad
18 Sept 2026 5:18 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि कानून की गलत व्याख्या या कानून की गलती, यदि किसी अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी ने अपने वैध अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए की, तो केवल इसी आधार पर उसके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती। विभागीय कार्रवाई के लिए आरोपों में बाहरी प्रभाव, अनुचित उद्देश्य या अन्य ऐसे तत्व सामने आने चाहिए, जो महज कानूनी गलती से आगे जाकर कदाचार की ओर संकेत करें।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके जरिए सहायक भविष्य निधि आयुक्त के खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई रद्द की गई थी।
मामला कटिहार मेडिकल कॉलेज से जुड़े भविष्य निधि संबंधी कार्यवाही का था। अधिकारी ने कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 की धारा 7C के तहत प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मामले की कार्यवाही की थी।
EPF अपीलीय अधिकरण द्वारा मामले को वापस भेजे जाने के बाद अधिकारी ने 4 नवंबर 2010 को कार्यवाही बंद करने का आदेश पारित किया।
इसके बाद अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई। आरोप लगाया गया कि उन्होंने जांच के दौरान लापरवाही और जल्दबाजी बरती। कार्यवाही के अंत में अधिकारी की पेंशन में पांच वर्ष के लिए 30 प्रतिशत कटौती की सजा दी गई।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने विभागीय कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि अर्ध-न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले अधिकारी द्वारा पारित आदेश या कानूनी निर्णय से असहमति मात्र विभागीय कार्यवाही का आधार नहीं बन सकती। हाईकोर्ट ने भी अधिकरण के इस निष्कर्ष से सहमति जताई।
पीठ ने कहा कि अर्ध-न्यायिक अधिकारी द्वारा वैध अधिकार क्षेत्र में काम करते हुए कानून की गलत व्याख्या करना या कानून की गलती करना अपने आप में विभागीय कार्यवाही शुरू करने का आधार नहीं हो सकता। आरोप पत्र में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित अधिकारी का आदेश किस तरह कदाचार की श्रेणी में आता है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर गलती कदाचार नहीं होती। किसी साधारण कानूनी गलती को कदाचार मानना अर्ध-न्यायिक अधिकारियों की स्वतंत्रता को प्रभावित करेगा। ऐसे अधिकारी के खिलाफ आरोप पत्र को टिकाए रखने के लिए केवल आदेश की शुद्धता पर सवाल उठाना पर्याप्त नहीं है। आरोपों में बाहरी विचार, अनुचित प्रभाव या गलत मंशा जैसे तत्व भी सामने आने चाहिए।
पीठ ने यह भी पाया कि आरोप पत्र में अधिकारी की ईमानदारी, नैतिक अधमता, बाहरी प्रभाव या अनुचित उद्देश्य से संबंधित कोई आरोप नहीं लगाया गया। ऐसे में केवल उनके अर्ध-न्यायिक आदेश को आधार बनाकर विभागीय कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती।
हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाते हुए EPFO की याचिका खारिज की।

