माता-पिता दोनों का प्यार बच्चे का बुनियादी अधिकार': झारखंड हाईकोर्ट ने पिता के मुलाकात का अधिकार बरकरार रखा, मां की कस्टडी में दखल से इनकार

  • माता-पिता दोनों का प्यार बच्चे का बुनियादी अधिकार: झारखंड हाईकोर्ट ने पिता के मुलाकात का अधिकार बरकरार रखा, मां की कस्टडी में दखल से इनकार

    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे के समुचित पालन-पोषण के लिए उसे माता-पिता दोनों का प्यार, स्नेह, देखभाल, साथ और सुरक्षा मिलना आवश्यक है। यह केवल बच्चे की जरूरत नहीं, बल्कि उसका बुनियादी मानवाधिकार भी है।

    इसी के साथ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें नाबालिग बच्चे की अस्थायी कस्टडी पिता को देने से मना किया गया था, लेकिन उसे हर महीने बच्चे से मिलने और व्हाट्सऐप के जरिए फोन पर बातचीत करने का अधिकार दिया गया।

    जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अखिल कुमार की खंडपीठ पिता की ओर से दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। अपील में रांची फैमिली कोर्ट के 23 सितंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई। फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 26 के तहत पिता की अर्जी को आंशिक रूप से स्वीकार किया था।

    दोनों पक्षों का विवाह 16 जुलाई 2012 को हुआ था और 24 मार्च 2021 को उनके बेटे का जन्म हुआ। पति के अनुसार, उसकी पत्नी 19 अगस्त 2023 को बच्चे को लेकर वैवाहिक घर छोड़कर चली गई।

    पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने उसे छोड़ दिया, वह व्यभिचार में रह रही थी और बार-बार संपर्क करने की कोशिश के बावजूद उसे बच्चे से मिलने नहीं दिया गया। उसने यह भी कहा कि वह पत्नी और बच्चे का खर्च उठा रहा था और दोनों को वापस अपने साथ रखने के लिए तैयार था।

    फैमिली कोर्ट ने बच्चे की अस्थायी कस्टडी पिता को देने से इनकार किया था। कोर्ट का मानना था कि बच्चे की मौजूदा कस्टडी मां से लेकर पिता को देने से उसके मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

    हालांकि, फैमिली कोर्ट ने पिता को महीने में एक बार दो घंटे बच्चे से मिलने और व्हाट्सऐप के माध्यम से फोन पर बातचीत करने की अनुमति दी थी।

    अपील पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने हिंदू अल्पसंख्यकता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 और 13 का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि भले ही पिता को प्राकृतिक संरक्षक के रूप में मान्यता दी गई, लेकिन बच्चे की कस्टडी तय करते समय उसका कल्याण सर्वोपरि होता है।

    खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कस्टडी से जुड़े विवादों का फैसला माता-पिता के आपसी अधिकारों के बजाय बच्चे के हित और कल्याण को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि पैरेंस पैट्रिए अधिकार क्षेत्र के तहत अदालत बच्चे की संरक्षक के रूप में कार्य कर सकती है और उसके सर्वोत्तम हितों की रक्षा कर सकती है। जरूरत पड़ने पर अदालत माता-पिता की इच्छा से अलग निर्णय भी ले सकती है।

    हाईकोर्ट ने गौर किया कि माता-पिता के अलग होने के बाद से बच्चा अपनी मां के साथ रह रहा था और फैमिली कोर्ट के आदेश के समय उसकी उम्र लगभग साढ़े तीन साल थी। ऐसे में उसकी मौजूदा कस्टडी में बदलाव करने से उसके कल्याण पर प्रतिकूल असर पड़ सकता था।

    हालांकि, पिता के मुलाकात के अधिकार पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि बच्चा अपने उचित पालन-पोषण के लिए माता-पिता दोनों के प्यार, स्नेह, देखभाल, साथ और सुरक्षा का हकदार है। यह केवल उसकी आवश्यकता नहीं, बल्कि उसका बुनियादी मानवाधिकार है।

    खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने पिता को हर महीने बच्चे से मिलने और फोन पर बातचीत करने की अनुमति देते समय दोनों माता-पिता के प्यार, देखभाल और स्नेह के महत्व पर विचार किया था।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले यशिता साहू बनाम राजस्थान राज्य, एआईआर 2020 एससी 577 का भी उल्लेख किया। इस फैसले में कहा गया था कि भले ही बच्चे की कस्टडी माता-पिता में से किसी एक के पास हो, लेकिन दूसरे अभिभावक को पर्याप्त मुलाकात का अधिकार मिलना चाहिए, ताकि बच्चा किसी भी माता-पिता के साथ सामाजिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक संपर्क से वंचित न रहे।

    हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने अंतरिम कस्टडी और मुलाकात का अधिकार तय करने से जुड़े सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार किया था। उसके आदेश में ऐसी कोई विकृति, मनमानी या अवैधता नहीं थी, जिसके आधार पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी हो।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार करते हुए पिता को दिए गए मुलाकात और फोन पर बातचीत के अधिकार को बरकरार रखा।

    Next Story