धारा 498ए में दहेज की मांग होना जरूरी नहीं, संपत्ति की कोई भी अवैध मांग क्रूरता के दायरे में: झारखंड हाईकोर्ट

Amir Ahmad

25 Aug 2026 5:08 PM IST

  • धारा 498ए में दहेज की मांग होना जरूरी नहीं, संपत्ति की कोई भी अवैध मांग क्रूरता के दायरे में: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत अपराध के लिए दहेज की मांग का आरोप होना जरूरी नहीं है। किसी महिला को संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की किसी भी अवैध मांग को पूरा करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से किया गया उत्पीड़न भी इस धारा के तहत क्रूरता माना जा सकता है।

    जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी आपराधिक पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने पति और उसके परिवार के सदस्यों को धारा 498ए और 323 के तहत दोषी ठहराने वाले निचली अदालत का फैसला बहाल किया। इससे पहले अपीलीय अदालत ने उनकी दोषसिद्धि रद्द कर उन्हें बरी किया।

    यह पुनर्विचार याचिका पत्नी ने घाटशिला के जिला एवं अपर सत्र जज-1 के फरवरी 2017 के फैसले के खिलाफ दायर की थी। अपीलीय अदालत ने धारा 498ए और 323 के तहत दी गई सजा रद्द कर दी थी।

    महिला की शादी जून 2008 में आरोपी पति से हुई थी। उसके अनुसार शादी के समय उसके परिवार ने पति और उसके परिवार को एक लाख रुपये नकद, सोने के आभूषण और घरेलू सामान दिए। महिला का आरोप था कि गर्भवती होने के बाद उसके पति ने चावल के कारोबार के लिए हॉलर मशीन खरीदने के नाम पर उसके पिता से एक लाख रुपये और मांगने शुरू कर दिए।

    महिला ने बताया कि उसके पिता UCIL से सेवानिवृत्त कर्मचारी थे और वह इतनी रकम देने की स्थिति में नहीं थे। इसके बाद पति और ससुराल वालों ने कथित तौर पर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।

    निचली अदालत ने पति और उसके परिवार के सदस्यों को धारा 498ए और 323 के तहत दोषी ठहराया। हालांकि, अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए दोषसिद्धि रद्द कर दी कि एक लाख रुपये की मांग पति के कारोबार को विकसित करने के लिए थी और इसका दहेज से कोई संबंध नहीं था। इसलिए अदालत ने माना था कि धारा 498ए लागू नहीं होती।

    झारखंड हाईकोर्ट ने इस तर्क को गलत ठहराया। कोर्ट ने कहा कि महिला के साथ क्रूरता के आरोपों की पुष्टि अन्य गवाहों के बयानों से भी होती है जिनमें एक स्वतंत्र ग्रामीण गवाह भी शामिल था।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 498ए में केवल दहेज की मांग को ही क्रूरता नहीं माना गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "इस परिभाषा में कहीं भी दहेज की मांग का उल्लेख नहीं है, बल्कि किसी संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की ऐसी मांग का उल्लेख है, जो अवैध हो।"

    कोर्ट ने कहा कि महिला के पिता से मांगी गई एक लाख रुपये की रकम को केवल पति के कारोबार के विकास के लिए लिया जाने वाला कर्ज बताया गया हो, ऐसा कोई बचाव भी सामने नहीं आया। इसके बजाय आरोप यह था कि रकम की अवैध मांग की गई और महिला पर शारीरिक तथा मानसिक दबाव डालकर उसे अपने पिता से पैसा लाने के लिए मजबूर किया गया।

    हाईकोर्ट ने माना कि ऐसे आरोप धारा 498ए के दायरे में आते हैं। कोर्ट ने अपीलीय अदालत के इस निष्कर्ष को कि रकम की मांग केवल पति के कारोबार के विकास के लिए थी और दहेज से संबंधित नहीं थी, उसे बहुत बेतुका बताया।

    कोर्ट ने कहा कि धारा 498ए में केवल दहेज की मांग की बात नहीं है, बल्कि "पैसे या संपत्ति की किसी भी अवैध मांग" को पूरा कराने के लिए महिला को प्रताड़ित करना भी इसके दायरे में आता है।

    हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत द्वारा आरोपियों को बरी करने के निष्कर्षों को पूरी तरह अनुचित, गैरकानूनी और विकृत करार दिया।

    इसके साथ ही अपीलीय अदालत का फैसला रद्द करते हुए निचली अदालत की दोषसिद्धि और सजा बहाल की। महिला की आपराधिक पुनर्विचार याचिका स्वीकार कर ली गई।

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