वैवाहिक क्रूरता साबित करने के लिए पहले पुलिस शिकायत या चोट का दस्तावेज जरूरी नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
Amir Ahmad
21 Aug 2026 3:28 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता और मारपीट के आरोपों को साबित करने के लिए पीड़िता की ओर से पहले पुलिस शिकायत दर्ज कराना या चोटों का चिकित्सकीय दस्तावेज पेश करना अनिवार्य मानना अनुचित है। अदालत ने ऐसी शर्त को बेतुका और अनावश्यक बताया।
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने पति को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत बरी करने वाले अपीलीय अदालत का फैसला रद्द किया और निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि तथा सजा बहाल की।
मामला सुषमा देवी और संजय कुमार उर्फ राजेश कुमार के विवाह से जुड़ा था। दोनों का विवाह मार्च 2007 में हुआ था। शिकायतकर्ता के अनुसार सगाई के समय उसके पिता ने आरोपियों की मांग पर ढाई लाख रुपये दिए। इसके अलावा करीब तीन लाख रुपये के आभूषण, घरेलू सामान और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं भी दी गई थीं।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि शादी के बाद पति और उसके परिवार के लोग दिए गए नकद और सामान से संतुष्ट नहीं थे तथा दो लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग करने लगे। मांग पूरी नहीं होने पर उसके साथ शारीरिक और मानसिक क्रूरता की गई तथा पर्याप्त भोजन और अन्य जरूरी सुविधाएं भी नहीं दी गईं।
उसने आरोप लगाया कि 15 अप्रैल 2007 को उसके पति, ननद और देवर ने उसके साथ मारपीट की और उसे वैवाहिक घर से निकाल दिया। इसके बाद उसने जमशेदपुर स्थित अपने मायके में शरण ली।
निचली अदालत ने पति समेत अन्य आरोपियों को धारा 498ए और दहेज निषेध कानून की धाराओं 3 और 4 के तहत दोषी ठहराया था। धारा 498ए के तहत तीन साल के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने तथा दहेज निषेध कानून के तहत दो साल के कठोर कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।
बाद में अपीलीय अदालत ने पति को धारा 498ए के आरोप से बरी कर दिया, हालांकि दहेज निषेध कानून के तहत उसकी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी। अन्य सह-आरोपियों को दोनों आरोपों से बरी किया गया।
इसके बाद पति ने दहेज निषेध कानून के तहत अपनी दोषसिद्धि को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जबकि शिकायतकर्ता ने आरोपियों को धारा 498ए से बरी किए जाने के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की।
मामले के साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने घटनाओं का क्रमवार विवरण दिया और यह बताया कि किन परिस्थितियों में उसके साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार और क्रूरता की गई।
अपीलीय अदालत के दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“मारपीट और प्रताड़ना के संबंध में पहले कोई मामला दर्ज कराने या चोट का कोई दस्तावेजी प्रमाण होने पर जोर देना इस मामले की परिस्थितियों में बिल्कुल बेतुका और अनावश्यक है।”
अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता उच्च शिक्षित महिला है और उसने तारीखों के साथ घटनाओं तथा उन परिस्थितियों का क्रमवार विवरण दिया, जिनमें उसके पति द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार और प्रताड़ना की गई।
हाईकोर्ट ने माना कि अपीलीय अदालत के निष्कर्ष उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप नहीं थे। अदालत ने यह भी कहा कि पीड़िता से यह अपेक्षा करना कि वह हर घटना के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराए, वैवाहिक क्रूरता के मामलों में उचित दृष्टिकोण नहीं है।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने संजय कुमार उर्फ राजेश कुमार को धारा 498ए के तहत बरी करने वाला अपीलीय अदालत का फैसला रद्द किया और निचली अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा बहालकर दी।


