हिरासत में मौत और दुष्कर्म मामलों की न्यायिक जांच खत्म करने वाले NHRC के आदेश को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती

Amir Ahmad

2 July 2026 1:56 PM IST

  • हिरासत में मौत और दुष्कर्म मामलों की न्यायिक जांच खत्म करने वाले NHRC के आदेश को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती

    झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई, जिसके जरिए हिरासत में मौत, हिरासत से लापता होने और हिरासत में दुष्कर्म के मामलों में अनिवार्य न्यायिक जांच संबंधी अपने पहले के निर्देश को वापस ले लिया गया था।

    याचिका में 14 मई 2024 का NHRC का सर्कुलर रद्द करने की मांग की गई। इस सर्कुलर में आयोग ने 4 सितंबर 2020 के अपने पूर्व निर्देश को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) लागू होने के बाद निष्प्रभावी बताते हुए उसे वापस और निरस्त कर दिया था।

    याचिका में NHRC को यह निर्देश देने की भी मांग की गई कि वह झारखंड हाईकोर्ट के हालिया फैसले मोहम्मद मुमताज अंसारी बनाम झारखंड राज्य (2026 एससीसी ऑनलाइन झारखंड 617) के अनुरूप नए दिशा-निर्देश जारी करे। इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि BNSS की धारा 196(2) के तहत होने वाली जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही की जानी अनिवार्य है और कार्यपालक मजिस्ट्रेट की जांच उसका विकल्प नहीं हो सकती।

    याचिकाकर्ता मोहम्मद मुमताज अंसारी जो धनबाद सिविल कोर्ट में वकील हैं उनका कहना है कि NHRC का विवादित सर्कुलर BNSS की धारा 194(4) और धारा 196(2) की गलत व्याख्या पर आधारित है।

    याचिका के अनुसार धारा 194(4) केवल कार्यपालक मजिस्ट्रेट को मृत्यु के प्रथम दृष्टया कारण का पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच (इनक्वेस्ट) करने का अधिकार देती है। वहीं धारा 196(2) हिरासत में मौत, हिरासत से लापता होने और हिरासत में दुष्कर्म जैसे मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा विस्तृत न्यायिक जांच अनिवार्य करती है।

    याचिकाकर्ता का आरोप है कि NHRC ने दोनों धाराओं को एक-दूसरे का विकल्प मानते हुए यह गलत निष्कर्ष निकाला कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट को जांच का अधिकार मिलने के बाद न्यायिक जांच की आवश्यकता समाप्त हो गई। जबकि दोनों प्रावधान अलग-अलग उद्देश्य पूरे करते हैं और उनकी प्रकृति भी अलग है।

    याचिका में कहा गया कि 2020 के सर्कुलर को वापस लेकर NHRC ने मानवाधिकारों की रक्षा संबंधी अपने वैधानिक दायित्व के विपरीत कदम उठाया। याचिकाकर्ता का कहना है कि आयोग को हिरासत में मौत और दुष्कर्म जैसे मामलों में न्यायिक जांच की व्यवस्था को और मजबूत करना चाहिए था न कि उसे गलत कानूनी व्याख्या के आधार पर समाप्त करना चाहिए।

    याचिका में यह भी कहा गया कि विवादित परिपत्र से हिरासत में मौत, हिरासत से लापता होने और हिरासत में दुष्कर्म के मामलों की जांच संबंधी प्रक्रियागत सुरक्षा व्यवस्था में खतरनाक कानूनी शून्य पैदा हो गया, जिससे ऐसे मामलों में जवाबदेही कमजोर पड़ने का खतरा है।

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