बिना कानूनी अधिकार दुकान तोड़ने पर मुआवजे के आदेश के खिलाफ राज्य की अपील खारिज: झारखंड हाईकोर्ट ने कार्रवाई को बताया मनमाना

Amir Ahmad

4 Aug 2026 4:45 PM IST

  • बिना कानूनी अधिकार दुकान तोड़ने पर मुआवजे के आदेश के खिलाफ राज्य की अपील खारिज: झारखंड हाईकोर्ट ने कार्रवाई को बताया मनमाना

    झारखंड हाईकोर्ट ने बिना कानूनी अधिकार के दुकान तोड़े जाने के मामले में दुकानदार को मुआवजा देने के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की अपील खारिज की। कोर्ट ने कहा कि यह अपील न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों ने खुद पर मुआवजे की जिम्मेदारी तय होने के डर से इसे दाखिल किया।

    चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार 13 साल तक चली रिट कार्यवाही के दौरान भूमि से जुड़े कोई स्वामित्व दस्तावेज पेश नहीं कर सकी और एकल पीठ के आदेश तथा अवमानना कार्यवाही शुरू होने के बाद अचानक पुराने दस्तावेज पेश करने का प्रयास किया गया।

    मामला हाईकोर्ट की एकल पीठ के 27 जून 2024 के आदेश से जुड़ा था, जिसमें राज्य सरकार को दुकानदार की दुकान दोबारा बनाने के लिए 5 लाख रुपये और मानसिक पीड़ा के लिए 25 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया गया। सिंगल बेंच ने पाया था कि राज्य अधिकारियों ने "मनमाने तरीके से" दुकानदार की दुकान गिरा दी थी।

    राज्य सरकार ने इस आदेश को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी। अपील में राज्य की ओर से दावा किया गया कि संबंधित जमीन वर्ष 1914 में सरकार द्वारा अधिग्रहित की गई। इसी आधार पर दुकान गिराने की कार्रवाई उचित थी।

    राज्य ने इन दस्तावेजों को अपील की सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति मांगी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस प्रयास को स्वीकार नहीं किया।

    खंडपीठ ने कहा कि राज्य यह स्पष्ट करने में विफल रहा कि जब रिट याचिका 13 वर्षों तक लंबित रही, तब ये दस्तावेज पहले क्यों पेश नहीं किए गए। कोर्ट ने यह भी कहा कि पेश किए गए दस्तावेजों से यह स्पष्ट नहीं होता कि वे विवादित संपत्ति से संबंधित हैं या नहीं।

    कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि संबंधित संपत्ति वर्ष 1973 में पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से दुकानदार ने खरीदी थी और सरकारी रिकॉर्ड में उसका नाम दर्ज किया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    "यह अपील न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों ने केवल इस आशंका के कारण अपील दाखिल की है कि उन पर जिम्मेदारी तय की जाएगी और सिंगल बेंच द्वारा दिए गए मुआवजे व लागत की राशि उन्हें देनी पड़ सकती है।"

    खंडपीठ ने कहा कि अपील की कार्यवाही में बाद में दस्तावेज शामिल करने का राज्य का प्रयास उसकी कार्रवाई को और संदिग्ध बनाता है।

    हाईकोर्ट ने सिंगल बेंच के उस निष्कर्ष को भी बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि दुकान गिराने की कार्रवाई "राज्य की मनमानी कार्रवाई" थी, जो बिना किसी कानूनी अधिकार के और सरकारी शक्तियों के दुरुपयोग के तहत की गई।

    कोर्ट ने कहा कि दिया गया मुआवजा भी कम है, फिर भी उसने एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

    राज्य सरकार की ओर से खंडपीठ के समक्ष 5.25 लाख रुपये की मुआवजा राशि एक सप्ताह के भीतर जमा करने का आश्वासन दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि राशि तय समय में जमा की जाए और चतरा के उपायुक्त को इसे सुनिश्चित करने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी दी।

    इसके बाद दुकानदार को सत्यापन के बाद मुआवजे की राशि निकालने की अनुमति दी गई।

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