रेलवे विशेषज्ञों के फैसले पर दोबारा विचार नहीं कर सकते कोर्ट': झारखंड हाईकोर्ट ने रोड ओवर ब्रिज बनाने की मांग वाली याचिका खारिज की

  • रेलवे विशेषज्ञों के फैसले पर दोबारा विचार नहीं कर सकते कोर्ट: झारखंड हाईकोर्ट ने रोड ओवर ब्रिज बनाने की मांग वाली याचिका खारिज की

    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि रेलवे अधिकारियों के तकनीकी और नीतिगत फैसलों में अदालतों के हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित है।

    चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने पलामू क्षेत्र में पंजरिकला गांव के पास लालगढ़ बिहार और राजहरा के बीच रोड ओवर ब्रिज (ROB) या गेटमैन युक्त रेलवे लेवल क्रॉसिंग बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर राहत देने से इनकार किया।

    जनहित याचिका में अधिकारियों को मौजूदा रेलवे लाइन पर गेटमैन युक्त लेवल क्रॉसिंग या रोड ओवर ब्रिज का निर्माण शुरू करने और निर्धारित समय में पूरा करने का निर्देश देने की मांग की गई।

    रेलवे की ओर से अदालत को बताया गया कि गांव के लोग लंबे समय से गेटमैन युक्त लेवल क्रॉसिंग या रोड ओवर ब्रिज की मांग कर रहे हैं, क्योंकि वे फिलहाल अनधिकृत तरीके से रेलवे लाइन पार करते हैं जिससे गंभीर सुरक्षा जोखिम पैदा होता है। हालांकि रेलवे ने कहा कि मौजूदा दिशानिर्देशों के तहत नई लेवल क्रॉसिंग खोलने की अनुमति नहीं है। इसके बजाय मौजूदा लेवल क्रॉसिंग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है और स्थान की परिस्थितियों के अनुसार सीमित ऊंचाई वाले सबवे (LHS) या रोड ओवर ब्रिज बनाए जा रहे हैं। रेलवे ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता जिस स्थान पर रोड ओवर ब्रिज बनाने की मांग कर रहे हैं, वहां लागू दिशानिर्देशों के तहत इसका निर्माण अनुमत नहीं है।

    रेलवे के पक्ष और मामले में शामिल तकनीकी तथा नीतिगत पहलुओं पर विचार करते हुए खंडपीठ ने कहा कि ये नीतिगत विषय हैं या ऐसे मामले हैं, जिनका फैसला संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों को करना है।

    अदालत ने टिप्पणी की कि इस क्षेत्र में विशेषज्ञों की राय पर दोबारा विचार करने या उसे अपने आकलन से बदलने की उसकी गुंजाइश बेहद सीमित है।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि रेलवे ने ग्रामीणों की चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया है। रेलवे पहले ही पंजरिकला और लालगढ़ बिहार गांवों के बीच सीमित ऊंचाई वाले सबवे का निर्माण शुरू कर चुका है। इसका उद्देश्य रेलवे लाइन पार करने के लिए ग्रामीणों को एक वैकल्पिक और अधिक सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराना है।

    इसी आधार पर कोर्ट ने रोड ओवर ब्रिज बनाने का आदेश देने से इनकार कर दिया। हालांकि, रेलवे ने बताया था कि सीमित ऊंचाई वाले सबवे का निर्माण पहले से चल रहा है। इस पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है, तो इसे चार महीने के भीतर पूरा किया जाए।

    याचिकाकर्ता की इस दलील पर भी अदालत ने विचार किया कि मानसून के दौरान सीमित ऊंचाई वाला सबवे अक्सर पानी में डूब सकता है।

    कोर्ट ने रेलवे को निर्देश दिया कि जलभराव की समस्या का समाधान करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएं। अदालत ने कहा कि सबवे के निर्माण पर बड़ी राशि खर्च करने का कोई मतलब नहीं होगा, यदि उसे उस उद्देश्य के लिए उपयोगी ही नहीं बनाया जाता जिसके लिए उसका निर्माण किया जा रहा है।

    खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिया कि सबवे ऐसा होना चाहिए जिससे स्कूली बच्चे और ग्रामीण रेलवे ट्रैक को अनधिकृत तरीके से पार करने के लिए मजबूर न हों और सुरक्षित रूप से रेलवे लाइन के दूसरी ओर जा सकें।

    इन सीमित निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका का निपटारा कर दिया। अदालत ने लागत के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया।

    अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story