जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कमजोर गवाहों की सुरक्षा के लिए नए नियम जारी किए, उम्र के अनुसार पूछताछ और वीडियो गवाही पर जोर दिया

  • जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कमजोर गवाहों की सुरक्षा के लिए नए नियम जारी किए, उम्र के अनुसार पूछताछ और वीडियो गवाही पर जोर दिया

    जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अदालत में संरक्षित गवाहों की गवाही कैसे दर्ज की जानी चाहिए, इस पर अपडेट दिशा-निर्देशों को मंजूरी दी। नए नियमों का उद्देश्य उन गवाहों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाना है जो अदालत में गवाही देते समय भयभीत महसूस कर सकते हैं।

    रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार ये अपडेट दिशा-निर्देश बच्चों, दिव्यांग लोगों, यौन हिंसा के पीड़ितों और धमकियों का सामना करने वाले गवाहों पर लागू होते हैं। इस कदम से न्याय प्रणाली को उन लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाने की उम्मीद है, जो आपराधिक न्याय प्रणाली की मौजूदा व्यवस्था में चुनौतियों का सामना करते हैं।

    कमजोर गवाहों के लिए सुरक्षा उपाय

    यह सुनिश्चित करने के लिए कि गवाह बिना किसी परेशानी के गवाही दे सकें, दिशा-निर्देश कुछ सुरक्षा उपाय प्रदान करते हैं

    बंद कमरे में कार्यवाही: अदालतें इन गवाहों की गोपनीयता की रक्षा के लिए उनकी जांच/क्रॉस एग्जामिनेशन तक सार्वजनिक पहुंच को प्रतिबंधित कर सकती हैं।

    लाइव वीडियो गवाही: गवाह अपनी परेशानी को कम करने के लिए किसी दूरस्थ स्थान से लाइव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाही दे सकते हैं।

    सहायक व्यक्ति: न्यायालय के समक्ष गवाही देते समय गवाहों के साथ उनके अभिभावक या कानूनी सहायता स्वयंसेवक हो सकते हैं।

    सुरक्षित प्रतीक्षा क्षेत्र: अभियुक्तों से मुठभेड़ से बचने के लिए गवाहों को अलग-अलग कमरों में सुरक्षित रूप से रखा जा सकता है।

    सूचित किए जाने का अधिकार: कमज़ोर गवाहों, उनके माता-पिता या अभिभावकों, वकीलों और सहायक व्यक्तियों को न्यायालय द्वारा प्रक्रिया के चरण के बारे में और यथासंभव अभियुक्तों के खिलाफ़ लगाए गए आरोपों और अन्य प्रक्रियाओं के बारे में तुरंत सूचित किया जाना चाहिए।

    आयु-उपयुक्त पूछताछ: न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गवाहों से पूछताछ आयु-विशिष्ट हो। बाल गवाहों के लिए, प्रश्न सरल, स्पष्ट और गैर-डराने वाले तरीके से पूछे जाने चाहिए।

    इन दिशानिर्देशों की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि कई कमज़ोर गवाहों के लिए न्यायालय में कदम रखना भारी पड़ सकता है। अपराध के शिकार हुए बच्चे, दुर्व्यवहार से बचे हुए लोग और विकलांग व्यक्ति अक्सर गवाही देने में कठिनाइयों का सामना करते हैं। अभियुक्त का सामना करने का डर आक्रामक जांच और लंबी अदालती कार्यवाही उन्हें बोलने से हतोत्साहित कर सकती है।

    आपराधिक न्यायालयों, किशोर बोर्ड और बच्चों के न्यायालयों के लिए निर्देश

    उच्च प्राथमिकता वाले गवाह: कमज़ोर गवाहों को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए और यथासंभव शीघ्रता से निपटा जाना चाहिए, अनावश्यक देरी और स्थगन को कम से कम किया जाना चाहिए ताकि अदालत में बार-बार पेश होने से बचा जा सके।

    निर्धारित सुनवाई: जजों को विकासात्मक रूप से उपयुक्त भाषा का उपयोग करना चाहिए और कमज़ोर गवाहों की शारीरिक ज़रूरतों, परीक्षा कार्यक्रम आदि पर विचार करते हुए सुनवाई कार्यक्रम तय करना चाहिए।

    पर्याप्त समय और अवसर: न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गवाहों को अपनी याददाश्त ताज़ा करने और सवालों के जवाब देने के लिए पर्याप्त समय और अवसर दिया जाए।

    यौन अपराध: न्यायाधीशों को गवाहों से स्पर्श करने के स्थान को प्रदर्शित करने के लिए कहने से बचना चाहिए और इसके बजाय उन्हें शरीर की रूपरेखा आरेख पर इसे इंगित करने की अनुमति देनी चाहिए।

    परिवहन लागत: न्यायाधीश उच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुसार गवाहों के लिए परिवहन प्रदान कर सकते हैं या परिवहन लागत की प्रतिपूर्ति कर सकते हैं।

    विशेष रूप से सक्षम गवाह: न्यायालयों को विशेष रूप से सक्षम गवाहों के मामले में अतिरिक्त उपाय प्रदान करने चाहिए। उदाहरण के लिए, धारा 313 BNSS के अनुपालन में ब्रेल में गवाह की गवाही दर्ज करना ताकि निर्भरता कम हो सके। इसके अलावा, समन, आदेश आदि जारी करने के लिए अन्य मोबाइल एप्लिकेशन, सांकेतिक भाषा और अन्य उपकरणों का उपयोग करना सुनिश्चित करना कि जानकारी सुलभ साधनों में उपलब्ध हो।

    अभियुक्त के निष्पक्ष परीक्षण के अधिकार के साथ संतुलन

    गवाहों को दी गई इन सुरक्षाओं को बचाव पक्ष के वकील द्वारा उनसे क्रॉस एक्जामिनेशन करने के अधिकार के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। हालांकि, न्यायालयों को यह निगरानी करनी चाहिए कि पूछताछ की दिशा गवाह को परेशान या डराने वाली न हो।

    दिशा-निर्देश गोपनीयता उपायों को मजबूत करने के लिए भी प्रदान करते हैं। कमजोर गवाहों की पहचान अदालत के रिकॉर्ड में गोपनीय रखी जाएगी। किसी भी वीडियो-रिकॉर्ड की गई गवाही को अदालत के आदेशों के तहत सख्ती से संरक्षित किया जाएगा।

    ये दिशा-निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू होते हैं और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में किशोर न्याय बोर्डों सहित सभी अदालतों पर लागू होते हैं। हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि निरंतर सुधार सुनिश्चित करने के लिए प्रणाली की सालाना समीक्षा की जाए। कानूनी विशेषज्ञ और अनुसंधान निकाय यह आकलन करने में शामिल होंगे कि दिशानिर्देशों का कार्यान्वयन कितनी अच्छी तरह किया जा रहा है।

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