पति SC समुदाय से है, इसलिए पत्नी के खिलाफ जातिसूचक अपशब्द कहने पर SC/ST Act लागू नहीं होगा: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
Amir Ahmad
12 Oct 2026 12:52 PM IST

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी महिला के खिलाफ जातिसूचक अपशब्दों का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन वह स्वयं अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित नहीं है तो केवल इस आधार पर SC/ST Act लागू नहीं होगा कि उसका पति अनुसूचित जाति समुदाय से है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कथित रूप से अपमानित किया गया अनुसूचित जाति का व्यक्ति घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं है तो प्रथम दृष्टया अधिनियम के तहत जातिगत अपमान से संबंधित अपराध नहीं बनता। हालांकि, जांच एजेंसी को मामले की जांच कर यह निर्धारित करना होगा कि अपराध के आवश्यक तत्व पूरे होते हैं या नहीं।
जस्टिस संजय धर ने देविंदर सिंह और अन्य आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। मामला बिश्नाह थाने में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 79, 351(2), 352 और 3(5) तथा SC/ST Act की धारा 3 के तहत दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है। आरोपियों ने प्राथमिकी रद्द करने की मांग भी की थी।
शिकायतकर्ता महिला का आरोप है कि आरोपी बिश्नाह स्थित एक खुले भूखंड में घुस आए और उसे तथा उसके पति को जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया। आरोप है कि उनके लिए चमार और चमारिन जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया।
एक आरोपी ने कथित तौर पर कहा,
“लात मारकर चमारिन को बाहर निकालो।"
महिला ने अश्लील भाषा का इस्तेमाल करने और धमकी देने का आरोप भी लगाया।
शिकायतकर्ता का पति अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित है और उसे 75 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता होने की बात कही गई है। हालांकि, कथित घटना के समय वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं था।
आरोपियों ने अदालत में दलील दी कि FIR जमीन और पेट्रोल पंप के संचालन से जुड़े लंबे समय से चल रहे दीवानी विवाद का नतीजा है। उनका कहना था कि शिकायतकर्ता स्वयं अनुसूचित जाति समुदाय से नहीं है और उसका पति भी घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं था। इसलिए कथित जातिसूचक अपशब्दों के आधार पर SC/ST Act के संबंधित प्रावधान लागू नहीं होते। दूसरी ओर, शिकायतकर्ता ने कहा कि उसे सार्वजनिक रूप से जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया गया और दीवानी विवाद लंबित होने से आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं रुकनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने विचार किया कि क्या FIR में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध बनाते हैं। ये प्रावधान सार्वजनिक दृष्टि में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को जानबूझकर अपमानित करने या डराने तथा जाति के नाम से अपमानित करने से संबंधित हैं।
जस्टिस संजय धर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले सुनीता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2018) 2 एससीसी 493 का हवाला देते हुए कहा कि जाति का निर्धारण जन्म से होता है, विवाह से नहीं। इसलिए किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति से विवाह करने मात्र से महिला उस समुदाय की सदस्य नहीं बन जाती। अदालत ने कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के खिलाफ जातिसूचक अपशब्दों का इस्तेमाल किया, तब भी केवल इस आधार पर SC/ST Act की धारा 3 के तहत अपराध नहीं बनता, क्योंकि शिकायतकर्ता स्वयं अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित नहीं है।
पति के खिलाफ कथित जातिसूचक अपशब्दों के आरोप पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले अस्मतुनिसा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (2011) 11 एससीसी 259 पर भरोसा किया। हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित प्रावधान के तहत अपराध बनने के लिए कथित रूप से अपमानित व्यक्ति का मौके पर मौजूद होना आवश्यक है, ताकि सार्वजनिक रूप से लोग उसे अपमानित होते हुए देख सकें। चूंकि शिकायतकर्ता का पति घटना के समय वहां मौजूद नहीं है, इसलिए प्रथम दृष्टया उसके संबंध में लगाए गए आरोपों से भी संबंधित अपराध बनता हुआ नहीं दिखता। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी मामले की जांच जारी रखे और कानून के तहत अपराध के आवश्यक तत्वों की मौजूदगी का आकलन करे।
अदालत ने पक्षों के बीच जमीन और पेट्रोल पंप के लेनदेन को लेकर चल रहे दीवानी विवाद पर भी ध्यान दिया। आरोपियों का कहना था कि तय रकम का भुगतान किया जा चुका है, जबकि शिकायतकर्ता ने दावा किया कि पूरी राशि नहीं मिली। इस विवाद से संबंधित दीवानी कार्यवाही सक्षम अदालत में लंबित है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि दीवानी विवाद ने शिकायतकर्ता को आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए प्रेरित किया हो।
आरोपों की प्रकृति और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपियों को जमानत दी। अदालत ने प्रत्येक आरोपी को 50,000 रुपये का जमानत बांड और जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया। साथ ही आरोपियों को जांच में सहयोग करने, अभियोजन पक्ष के गवाहों को प्रभावित नहीं करने और जांच अधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश से बाहर नहीं जाने की शर्त लगाई।
हाईकोर्ट ने जांच जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन निर्देश दिया कि उसकी अनुमति के बिना सक्षम अदालत में आरोपपत्र दाखिल नहीं किया जाए। अदालत ने शिकायतकर्ता को हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को भी कहा कि क्या उसने जम्मू के सब-जज (सिटी जज) की अदालत में लंबित दीवानी मुकदमा दायर किया और क्या संबंधित वादपत्र तथा वकालतनामे पर उसके हस्ताक्षर हैं।
हाईकोर्ट ने जमानत याचिका का निपटारा किया, जबकि FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका को आगे की सुनवाई के लिए 16 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

