बिना वैलिड परमिट और फिटनेस सर्टिफिकेट के गाड़ी चलाना इंश्योरेंस पॉलिसी का उल्लंघन: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
18 Sept 2026 6:34 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि बिना वैलिड परमिट और फिटनेस सर्टिफिकेट के ट्रांसपोर्ट गाड़ी चलाना इंश्योरेंस पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा कि इंश्योरेंस कंपनी पर मुआवज़े की पूरी ज़िम्मेदारी नहीं डाली जा सकती, लेकिन "पे एंड रिकवर" (पहले भुगतान करें और फिर वसूलें) सिद्धांत लागू करते हुए इंश्योरेंस कंपनी को निर्देश दिया कि वह पहले मुआवज़े की रकम का भुगतान करे और फिर गाड़ी के मालिक से वह रकम वसूल ले।
जस्टिस सुशील कुकरेजा ने कहा:
"चूंकि दुर्घटना के दिन संबंधित गाड़ी के पास परमिट और फिटनेस सर्टिफिकेट नहीं था, इसलिए इंश्योरेंस पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ। इसलिए निचली ट्रिब्यूनल ने अपीलकर्ता/इंश्योरेंस कंपनी पर गलत तरीके से ज़िम्मेदारी डाली है।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 11 नवंबर, 2013 की सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें 24 वर्षीय भूपिंदर की मौत हो गई। वह जिस टाटा सूमो में यात्रा कर रहे थे, वह चंबा के कोवाजी मोड़ के पास सड़क से उतरकर खाई में गिर गई। उनके कानूनी प्रतिनिधियों ने लापरवाही से गाड़ी चलाने का आरोप लगाते हुए ₹15 लाख के मुआवज़े के लिए क्लेम याचिका दायर की।
मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने 7.5% ब्याज के साथ ₹8,08,200 का मुआवज़ा देने का आदेश दिया और इंश्योरेंस कंपनी को मुआवज़े की रकम का भुगतान करने का निर्देश दिया। इससे असंतुष्ट होकर इंश्योरेंस कंपनी हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट पहुंची और तर्क दिया कि गाड़ी बिना वैलिड परमिट और फिटनेस सर्टिफिकेट के चलाई जा रही थी, जो इंश्योरेंस पॉलिसी का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित गाड़ी एक ट्रांसपोर्ट गाड़ी थी और दुर्घटना के दिन बिना वैलिड परमिट के चलाई जा रही थी।
कोर्ट ने यह भी पाया कि गाड़ी का फिटनेस सर्टिफिकेट 2005 में ही खत्म हो गया, जबकि दुर्घटना 2013 में हुई। मोटर व्हीकल्स एक्ट (MV Act) की धारा 39 और 56 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि बिना वैलिड फिटनेस सर्टिफिकेट वाली ट्रांसपोर्ट गाड़ी को बिना रजिस्ट्रेशन वाली गाड़ी माना जाता है और उसे कानूनी रूप से सड़क पर नहीं चलाया जा सकता।
इसके अनुसार, कोर्ट ने माना कि परमिट और फिटनेस सर्टिफिकेट दोनों का न होना इंश्योरेंस पॉलिसी का बुनियादी उल्लंघन है। हालांकि मुआवज़ा देने की मुख्य ज़िम्मेदारी मालिक की थी, लेकिन इंश्योरेंस कंपनी को निर्देश दिया गया कि वह पहले मुआवज़े की रकम का भुगतान करे और फिर मालिक से वह रकम वसूल ले।
Case Name: Oriental Insurance Co. Ltd. v/s Jamana & Ors.

