जांच में देरी भ्रष्टाचार की FIR रद्द करने का आधार नहीं, जब तक आरोपी निष्पक्ष सुनवाई में बाधा साबित न करे: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
23 Jun 2026 8:07 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) के तहत दर्ज FIR को सिर्फ़ जांच या चार्ज-शीट दाखिल करने में हुई देरी के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता, जब तक कि आरोपी यह साबित न कर दे कि इस देरी से निष्पक्ष सुनवाई पर बुरा असर पड़ा है।
धर्मशाला नगर समिति द्वारा कचरा कंटेनर खरीदने में कथित अनियमितताओं से जुड़ी भ्रष्टाचार की कार्यवाही रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में जनहित शामिल होता है और इन्हें आमतौर पर केवल समय बीत जाने के कारण खत्म नहीं किया जा सकता।
जस्टिस राकेश कैंथला ने कहा:
"हालांकि देरी काफी ज़्यादा और अफसोसजनक है, लेकिन कोर्ट इस बात से सहमत नहीं है कि इससे अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाकर्ता के निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हुआ, जिसके लिए FIR रद्द करने जैसी असाधारण राहत दी जाए। मुख्य बात यह है कि क्या देरी से आरोपी को ऐसा नुकसान हुआ, जिससे सुनवाई अनुचित या दमनकारी हो गई... इसलिए देरी अफसोसजनक होने के बावजूद, इससे निष्पक्ष सुनवाई से इनकार जैसी कोई स्थिति नहीं बनी है, इसलिए कार्यवाही रद्द करने जैसी असाधारण राहत नहीं दी जा सकती।"
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने 2016 में राज्य सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (State Vigilance and Anti-Corruption Bureau) द्वारा धर्मशाला नगर समिति के कचरा कंटेनर खरीदने में कथित अनियमितताओं के संबंध में दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जांच में लगभग आठ साल लग गए और कार्यवाही जारी रहने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, नगर पालिका अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के साथ मिलीभगत करके तय वित्तीय और खरीद प्रक्रियाओं का उल्लंघन करते हुए ₹1.45 करोड़ से अधिक मूल्य के कचरा कंटेनर खरीदे। जांच में कथित तौर पर गंभीर अनियमितताएं सामने आईं, जिनमें उचित प्रस्तावों के बिना खरीद, ई-टेंडरिंग आवश्यकताओं का पालन न करना और जाली कोटेशन जमा करना शामिल था, जिसके कारण IPC और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों के लिए चार्ज-शीट दाखिल की गई।
याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं और इनमें बड़ा जनहित शामिल होता है। अदालत ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में सिर्फ़ जांच या चार्ज-शीट दाखिल करने में देरी के आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा कि हालांकि जल्द सुनवाई का अधिकार जांच के चरण तक भी लागू होता है, लेकिन कार्यवाही तभी रद्द की जा सकती है, जब देरी से ऐसा नुकसान हो कि सुनवाई अनुचित या दमनकारी हो जाए। इस मामले में याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाया कि देरी के कारण उसका बचाव प्रभावित हुआ, कोई अहम सबूत खो गया, या गवाह उपलब्ध नहीं रहे।
अदालत ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार से जुड़ी FIR को केवल असाधारण स्थितियों में ही रद्द किया जाना चाहिए, जब रिकॉर्ड में आरोपी के खिलाफ कोई ठोस सामग्री या उचित संदेह न हो और अभियोजन पक्ष की मंशा पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण लगे।
यह कहते हुए कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' के तहत दर्ज FIR को केवल देरी के आधार पर रद्द करना जायज़ नहीं है, अदालत ने याचिका खारिज की और स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का सुनवाई के गुण-दोष पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
Case Name: Rajesh Kakkar v. State of Himachal Pradesh & Anr.

