प्रधानमंत्री की एजुकेशनल क्वालिफिकेशन और डिग्री का खुलासा करने में कोई जनहित नहीं: गुजरात हाईकोर्ट
Shahadat
30 Sept 2026 3:44 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री की एजुकेशनल डिग्री का खुलासा करने में कोई जनहित नहीं है, क्योंकि वे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि हैं और संवैधानिक पद पर उनके चुनाव से उनकी एजुकेशनल क्वालिफिकेशन का कोई लेना-देना नहीं है। [2026 LiveLaw (Guj) 263]
कोर्ट ने यह बात केजरीवाल की उस अपील को खारिज करते हुए कही, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से जुड़ी जानकारी के खुलासे के मामले में उन पर ₹25,000 का जुर्माना लगाने के आदेश को चुनौती दी थी।
केजरीवाल ने मार्च 2023 के सिंगल जज के फैसले के खिलाफ अपील की। उस फैसले में सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (CIC) के 2016 का वह निर्देश रद्द किया, जिसमें गुजरात यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम की डिग्री से जुड़ी जानकारी देने के लिए कहा गथा। यूनिवर्सिटी ने CIC के निर्देश को चुनौती देते हुए सिंगल जज के पास अपील की थी।
डिग्री के खुलासे के संबंध में यूनिवर्सिटी की 'फिड्यूशरी ड्यूटी' (भरोसे या विश्वास पर आधारित जिम्मेदारी) पर चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीएन रे की डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति की एजुकेशनल क्वालिफिकेशन से जुड़े डॉक्यूमेंट्स, जैसे मार्क-शीट और डिग्री, उस व्यक्ति की 'पर्सनल जानकारी' के दायरे में आते हैं। RTI Act की संशोधित धारा 8(1)(j) के तहत इनके खुलासे से छूट दी गई है (हालांकि बिना संशोधन वाली धारा में भी अपवाद लागू थे)।
कोर्ट ने आगे कहा कि यह जानकारी यूनिवर्सिटी/बोर्ड/एग्जामिनिंग बॉडीज़ अपने पूर्व छात्रों की ओर से 'फिड्यूशरी कैपेसिटी' (भरोसे या विश्वास पर आधारित जिम्मेदारी) में रखती हैं। RTI Act की धारा 8(1)(e) के तहत भी इसके खुलासे से छूट दी गई है, सिवाय तब जब बड़े जनहित में इसका खुलासा करना ज़रूरी हो।
कोर्ट ने कहा,
"सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, RTI Act के तहत छूट का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए। इसका मतलब है कि धारा 8 की उप-धारा (1) के क्लॉज़ (e) के तहत आने वाली जानकारी के मामले में, जिस व्यक्ति या अथॉरिटी के पास यह जानकारी 'फिड्यूशरी' (भरोसे या विश्वास) के नाते है, उस पर किसी नागरिक को यह जानकारी देने की कोई बाध्यता नहीं है। ऐसा तभी किया जा सकता है, जब वह व्यक्ति या अथॉरिटी इस बात से संतुष्ट हो कि व्यापक जनहित में ऐसी जानकारी का खुलासा करना ज़रूरी है। धारा 8 के तहत छूट प्राप्त कोई भी जानकारी एक्ट के तहत खुलासे से सुरक्षित है और RTI Act की धारा 6(1) के तहत मिली अर्ज़ी पर पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर ऐसी जानकारी देने से इनकार कर सकता है।
इस मामले में धारा 8 की उप-धारा (1) के क्लॉज़ (e) और (j) (संशोधित सहित) दोनों के तहत छूट की शर्तें पूरी होती हैं। यह माना जाएगा कि यूनिवर्सिटी के पास अपने छात्रों की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी 'फिड्यूशरी' रिश्ते के तहत है और डिग्री/शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी व्यक्तिगत जानकारी होने के नाते क्लॉज़ (j) के तहत छूट के दायरे में आती है। दोनों क्लॉज़ के तहत ऐसी जानकारी का खुलासा तभी ज़रूरी है, जब 'व्यापक जनहित' में ऐसा करना उचित हो। भारत के प्रधानमंत्री, जो जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं, उनकी शैक्षणिक योग्यता की जानकारी मांगने में किसी जनहित या व्यापक जनहित की ज़रूरत नहीं है, खासकर तब जब उनकी शैक्षणिक योग्यता का उनके संवैधानिक पद पर चुने जाने से कोई लेना-देना न हो।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि CIC के आदेश में कोई कारण नहीं बताया गया कि RTI Act की धारा 8(1) के क्लॉज़ (e) और (j) के तहत ऐसी जानकारी का खुलासा करना क्यों ज़रूरी है।
कोर्ट ने कहा कि आदेश में की गई यह "हल्की-फुल्की टिप्पणी" - कि किसी पब्लिक अथॉरिटी, सरकारी कर्मचारी या संवैधानिक पद पर बैठे राजनीतिक नेता की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी RTI Act की धारा 8 के दायरे में नहीं आती - सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के सेंट्रल पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल (2020) और के.एस. पुट्टास्वामी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (2017) के फैसलों के खिलाफ है।
कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार (Right to privacy) धारा 8(1) के क्लॉज़ (e), (g), (j) में सुरक्षित है, जो आर्टिकल 21 के तहत मिले अधिकारों पर आधारित है। धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया है और इसे डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 की धारा 44(3) से बदल दिया गया है। संशोधित प्रावधान में, "व्यक्तिगत जानकारी से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए पूरी छूट" दी गई है।
कोर्ट ने कहा कि यह संशोधन भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिले निजता के अधिकार की सुरक्षा के अनुरूप है, जैसा कि के.एस. पुट्टास्वामी मामले में नौ जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच ने कहा था।
कोर्ट ने कहा कि RTI Act के संदर्भ में 'जनहित टेस्ट' (Public Interest Test) का मतलब है - सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के पीछे के मकसद और उद्देश्य पर विचार करना; साथ ही किसी खास जानकारी और व्यक्ति के संदर्भ में निजता के उल्लंघन, गोपनीयता भंग होने और तीसरे पक्ष को होने वाले संभावित नुकसान और चोट के नतीजों पर भी गौर करना।
कोर्ट ने आगे कहा,
"ऊपर की चर्चा को देखते हुए हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि सिर्फ़ इसलिए कि मांगी गई जानकारी देश के प्रधानमंत्री की एजुकेशनल डिग्री के बारे में थी, इसका मतलब यह नहीं है कि वह जानकारी अपने आप 'जनहित या व्यापक जनहित' के दायरे में आ जाएगी, जो एक्ट की धारा 8(1)(e) और (j) के तहत छूट के अपवाद हैं। CIC ने कहा था कि प्रधानमंत्री की एजुकेशनल डिग्री के बारे में जानकारी पहले से ही पब्लिक डोमेन में है, लेकिन RTI Act के तहत दायित्वों पर विचार करने के मामले में इस बात का कोई महत्व नहीं है।"
कोर्ट ने यह भी देखा कि इन्फॉर्मेशन कमिश्नर ने PMO (प्रधानमंत्री कार्यालय) को डिग्री का "खास नंबर और साल" और "दिल्ली यूनिवर्सिटी और गुजरात यूनिवर्सिटी ऑफिस को PG डिग्री" बताने का निर्देश दिया ताकि यूनिवर्सिटी उससे जुड़े दस्तावेज़ खोज और उपलब्ध करा सके। साथ ही DU के PIO और गुजरात यूनिवर्सिटी को डिग्री के बारे में जानकारी खोजने और केजरीवाल को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया - ये सभी निर्देश सीधे तौर पर RTI Act की धारा 8(1)(e) और (j) का उल्लंघन करते हैं।
कोर्ट ने कहा,
"जिन जानकारियों को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया, उनमें से किसी को भी जनहित या व्यापक जनहित में सार्वजनिक करना ज़रूरी नहीं कहा जा सकता।"
कोर्ट ने आगे देखा कि RTI Act के तहत दूसरी अपील के चरण में AAP नेता अरविंद केजरीवाल के लिखे पत्र पर CIC का स्वतः संज्ञान लेना और गुजरात यूनिवर्सिटी को पीएम नरेंद्र मोदी की डिग्री सार्वजनिक करने का निर्देश देना अधिकार क्षेत्र से बाहर और तय प्रक्रिया के खिलाफ़ है।
कोर्ट ने सिंगल जज के आदेश में कोई गलती न पाते हुए अपील खारिज की।
Case title: ARVIND KEJRIWAL v/s GUJARAT UNIVERSITY & ORS.

