मुस्लिम लॉ के तहत बालिग होने तक माँ के साथ पिता के परिवार के पास भी रहेगी बेटी की कस्टडी: गुजरात हाईकोर्ट

Shahadat

17 Sept 2026 6:05 PM IST

  • मुस्लिम लॉ के तहत बालिग होने तक माँ के साथ पिता के परिवार के पास भी रहेगी बेटी की कस्टडी: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही मुस्लिम कानून के तहत एक महिला को अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी तब तक पाने का अधिकार है, जब तक वह बालिग (Puberty) नहीं हो जाती, लेकिन पिता के परिवार के पास बच्चे की कस्टडी होने को गैर-कानूनी कैद नहीं कहा जा सकता। [2026 LiveLaw (Guj) 248]

    याचिकाकर्ता नाबालिग की दादी और बुआ हैं, जिनके पास उसकी कस्टडी है, जबकि प्रतिवादी नंबर 2 नाबालिग की सगी माँ है।

    माँ ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में CrPC की धारा 97 (गलत तरीके से कैद किए गए लोगों की खोज) के तहत अर्जी दायर की। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 09.09.2022 को याचिकाकर्ताओं को नाबालिग की कस्टडी माँ को सौंपने का निर्देश दिया। इससे नाराज होकर याचिकाकर्ता सेशन कोर्ट गए, जिसने 23.09.2022 को उनकी याचिका खारिज की।

    इसके खिलाफ याचिकाकर्ता हाईकोर्ट गए।

    एक बेंच ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दी थी; इसके बाद माँ को हर रविवार बच्चे से मिलने की अनुमति दी गई। माँ सुप्रीम कोर्ट गई, जिसने हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह अंतरिम राहत रद्द करने की माँ की अर्जी पर जल्द-से-जल्द सुनवाई करे।

    इसके बाद 23.02.2024 को हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दो दिनों के भीतर बच्चे की कस्टडी माँ को सौंपने का निर्देश दिया। ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस स्टेशन को आदेशों का पालन करने का निर्देश दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता फिर से सुप्रीम कोर्ट गए, जिसने 11.03.2024 को हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और निर्देश दिया कि मौजूदा कार्यवाही के अंतिम निपटारे तक बच्चा याचिकाकर्ताओं के पास ही रहेगा।

    जस्टिस एमआर मेंगडे ने अपने आदेश में कहा कि जब मामला सेशन कोर्ट के सामने गया तो उसने मोहम्मडन लॉ की धारा 352 पर विचार किया और पाया कि इस प्रावधान के अनुसार, बालिग होने (Puberty) की उम्र तक नाबालिग बच्ची की कस्टडी माँ के पास रहेगी। कोर्ट ने कहा कि रिविज़न की कार्यवाही में सेशंस कोर्ट को यह तय करना था कि क्या याचिकाकर्ताओं के पास नाबालिग की कस्टडी गैर-कानूनी कैद के बराबर है और क्या मौजूदा मामले के तथ्यों में CrPC की धारा 97 के तहत कार्यवाही की जा सकती है।

    कोर्ट ने कहा,

    "ऐसा करने के बजाय सेशंस कोर्ट ने मोहम्मडन लॉ के तहत नाबालिग की कस्टडी के अधिकार के मुद्दे पर फैसला किया और इस तरह रिविज़न अर्ज़ी खारिज की। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि सिर्फ़ इसलिए कि मोहम्मडन लॉ प्रतिवादी नंबर 2 को नाबालिग बेटी के बालिग होने (Puberty की उम्र तक पहुँचने) तक उसकी कस्टडी रखने का अधिकार देता है, याचिकाकर्ताओं के पास उसकी कस्टडी को गैर-कानूनी कैद नहीं कहा जा सकता। इन हालात में सेशंस कोर्ट का आदेश रद्द किया जाता है और मामले को फिर से विचार करने और नया फैसला लेने के लिए सेशंस कोर्ट को वापस भेजा जाता है।"

    कोर्ट ने सेशंस कोर्ट को यह भी निर्देश दिया कि वह दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद मामले पर जल्द-से-जल्द, यानी छह महीने के भीतर नए सिरे से फैसला करे।

    कोर्ट ने कहा कि जब तक सेशंस कोर्ट मामले पर नए सिरे से फैसला नहीं करता, तब तक माँ को हर दिन नाबालिग से मिलने की अनुमति देने वाली अंतरिम व्यवस्था जारी रहेगी।

    याचिका मंज़ूर की गई।

    Case title: SHAIFIYA VAJIUDDIN CONTRACTOR & ORS. v/s STATE OF GUJARAT & ANR.

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