गुजरात हाईकोर्ट ने 'गुजराती' में केस की सुनवाई से किया इनकार, कहा- हाईकोर्ट की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है
Shahadat
22 Jan 2026 9:15 AM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति की याचिका खारिज की, जो खुद पार्टी के तौर पर पेश हुआ था। उसने हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज (HCLS) कमेटी द्वारा जारी सर्टिफिकेट को चुनौती दी थी, जिसमें उसे कोर्ट के सामने अंग्रेजी भाषा में अपना केस लड़ने के लिए "अयोग्य" बताया गया।
याचिकाकर्ता ने उस सर्टिफिकेट को चुनौती दी थी, जिसके तहत कमेटी ने याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट में खुद पार्टी के तौर पर अपना केस लड़ने की इजाजत देने से इनकार किया। याचिकाकर्ता ने इस आधार पर सर्टिफिकेट को रद्द करने की मांग की कि हाई कोर्ट में अंग्रेजी भाषा में कार्यवाही करना उसके अधिकार का उल्लंघन करता है और उसे गुजराती भाषा में अपना केस लड़ने की इजाजत दी जानी चाहिए।
जस्टिस अनिरुद्ध पी. मयी ने 'सर्टिफिकेट में कोई कमी नहीं' पाई और कहा,
“याचिकाकर्ता को 21.08.2025 का सर्टिफिकेट जारी किया गया, जिसमें उसे अयोग्य ठहराया गया। प्रतिवादियों ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता की शैक्षणिक योग्यता 10वीं पास है; वह अंग्रेजी भाषा समझने में असमर्थ है; वह अंग्रेजी भाषा में खुद को व्यक्त करने में असमर्थ है और उसके विचारों में स्पष्टता नहीं है। वह मामले के तथ्यों को अंग्रेजी भाषा में समझाने में असमर्थ है। इसलिए वह व्यक्तिगत रूप से कोर्ट की सहायता करने में सक्षम नहीं है। उसे अपनी पसंद का वकील नियुक्त करने या हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी से संपर्क करने की सलाह दी जाती है... मामले की समग्र समीक्षा में प्रतिवादियों द्वारा दिए गए सर्टिफिकेट में कोई कमी नहीं है। विशेष सिविल आवेदन में कोई दम नहीं है। इसलिए इसे खारिज किया जाता है।”
कोर्ट ने अपने आदेश में 2015 के एक मामले सुओ-मोटो बनाम मनीष कन्हैयालाल गुप्ता और अन्य का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया:
1. गुजरात हाईकोर्ट की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। इसलिए केस की प्रस्तुति अंग्रेजी में होनी चाहिए। यह अंग्रेजी भाषा के अलावा किसी अन्य भाषा में नहीं हो सकती।
2. कमेटी किसी पार्टी-इन-पर्सन की योग्यता को तभी प्रमाणित कर सकती है, जब उस व्यक्ति में अंग्रेजी समझने, व्यक्त करने की क्षमता हो और अंग्रेजी में केस समझाने के लिए विचारों में स्पष्टता हो।
3. कोई भी पार्टी-इन-पर्सन अंग्रेजी भाषा के अलावा किसी अन्य भाषा में कोर्ट को संबोधित नहीं कर पाएगी और जब तक उसकी योग्यता कमेटी द्वारा प्रमाणित नहीं हो जाती। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सुओ-मोटो बनाम मनीष कनैयलाल गुप्ता और अन्य के मामले में फैसले को 'कमेटी ने गलत समझा' है।
प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि जारी किया गया सर्टिफिकेट सही और उचित है, क्योंकि कमेटी ने याचिकाकर्ता का मूल्यांकन तय कानून और नियमों के अनुसार किया। उन्होंने आगे तर्क दिया कि याचिकाकर्ता गुजराती भाषा में बहस करने पर जोर नहीं दे सकता और उसे अंग्रेजी में बहस करने के लिए एक इंटरप्रेटर की ज़रूरत होगी, क्योंकि वह अंग्रेजी नहीं समझता है। इसलिए उन्होंने कहा कि प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ता को सर्टिफिकेट देने से सही इनकार किया।
कोर्ट ने कहा कि उसने याचिकाकर्ता को इस याचिका में कानूनी सहायता देने के लिए हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी से संपर्क करने का भी निर्देश दिया, जिसके बाद हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी ने याचिकाकर्ता को इस मामले में बहस करने के लिए वकील दिया।
इसके बाद कोर्ट ने मामले को मेरिट के बिना पाते हुए खारिज किया।
Case Title: Sanjaybhai Bhikabhai Parvadiya vs Pranav S. Dave, Judicial Registrar & Anr.

