गुजरात हाईकोर्ट का फैसला: अलिबी साबित होने पर आरोपी बरी, जांच अधिकारी की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी

Praveen Mishra

4 May 2026 10:44 PM IST

  • गुजरात हाईकोर्ट का फैसला: अलिबी साबित होने पर आरोपी बरी, जांच अधिकारी की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी

    गुजरात हाईकोर्ट ने एक हत्या मामले में आरोपी को बरी करते हुए कहा कि उसने अलिबी (घटना के समय किसी अन्य स्थान पर होने) का जो दावा किया था, वह 13 स्वतंत्र गवाहों से साबित होता है, लेकिन इस महत्वपूर्ण साक्ष्य को चार्जशीट के साथ जानबूझकर पेश नहीं किया गया।

    जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छानी की खंडपीठ ने कहा कि जांच अधिकारी द्वारा इस साक्ष्य को रिकॉर्ड पर न रखना गंभीर कर्तव्य-लोप (dereliction of duty) है और इससे अभियोजन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

    क्या है मामला?

    अभियोजन के अनुसार, पुरानी दुश्मनी के चलते आरोपियों ने मिलकर हत्या की साजिश रची। आरोप था कि आरोपी नंबर 2 जस्मिनभाई भारतभाई कोठारी ने रिवॉल्वर से गोली चलाई, जबकि आरोपी नंबर 1आसिम उर्फ मुनमुन उर्फ आसिफ अब्दुलकरीमभाई सोलंकी ने फर्सी (कुल्हाड़ी जैसे हथियार) से हमला कर गंभीर चोटें पहुंचाईं।

    अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

    हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी नंबर 1 ने शुरुआत से ही अलिबी का दावा किया था कि घटना के समय वह बोताद में मौजूद नहीं था, बल्कि आनंद में था। जांच के दौरान 13 स्वतंत्र गवाहों—जिनमें पुलिसकर्मी, सब्जी विक्रेता और व्यापारी शामिल थे—के बयान दर्ज किए गए थे और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) भी उसके आनंद में होने की पुष्टि करते थे।

    इसके बावजूद यह सारा साक्ष्य चार्जशीट के साथ अदालत में पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि यह “जानबूझकर दबाया गया” प्रतीत होता है और इससे सच्चाई तक पहुंचने के प्रयास में गंभीर कमी दिखाई देती है।

    अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के अलिबी को खारिज करने में असफल रहा और इसलिए आरोपी नंबर 1 को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाता है।

    आरोपी नंबर 2 पर फैसला

    वहीं, आरोपी नंबर 2 जस्मिनभाई कोठारी के खिलाफ शिकायतकर्ता की गवाही, मेडिकल साक्ष्य, एफएसएल रिपोर्ट और घटनास्थल के साक्ष्य से यह साबित हुआ कि उसने गोली चलाई थी। अदालत ने कहा कि हत्या का आरोप (धारा 302 सहपठित धारा 34 IPC) संदेह से परे सिद्ध होता है।

    हालांकि, अदालत ने डकैती (धारा 397 IPC) के आरोप को खारिज कर दिया क्योंकि कथित लूट का कोई सामान बरामद नहीं हुआ।

    निष्कर्ष

    हाईकोर्ट ने आरोपी नंबर 1 की अपील स्वीकार करते हुए उसे बरी कर दिया, जबकि आरोपी नंबर 2 की अपील खारिज कर दी। अदालत ने जांच अधिकारी और अभियोजन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह की लापरवाही न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है।

    Next Story