5 वर्ष से कम आयु की बालिका की प्राकृतिक संरक्षक माँ, विवादित सेपरेशन डीड से पिता को अभिरक्षा नहीं: गुजरात हाईकोर्ट

Praveen Mishra

23 Feb 2026 5:58 PM IST

  • 5 वर्ष से कम आयु की बालिका की प्राकृतिक संरक्षक माँ, विवादित सेपरेशन डीड से पिता को अभिरक्षा नहीं: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने कहा है कि हिंदू अल्पसंख्यकता एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 के तहत पाँच वर्ष से कम आयु की बालिका की प्राकृतिक संरक्षक उसकी माँ होती है, क्योंकि इतनी कम उम्र के बच्चे की देखभाल पिता की तुलना में माँ ही अधिक प्रभावी ढंग से कर सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवादित पृथक्करण विलेख (सेपरेशन डीड) के आधार पर पिता द्वारा अभिरक्षा का दावा करने से माँ द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका की ग्राह्यता पर कोई असर नहीं पड़ता।

    जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस डी.एम. व्यास की खंडपीठ एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने अपनी चार वर्षीय बेटी की अभिरक्षा मांगी थी। महिला का आरोप था कि उसके अलग रह रहे पति ने धोखे और दबाव से उससे एक पृथक्करण विलेख पर हस्ताक्षर करवाकर बच्ची को अपने पास रख लिया। अदालत ने कहा कि धारा 6(क) के प्रावधान के अनुसार पाँच वर्ष से कम आयु की बालिका की प्राकृतिक संरक्षक माँ ही होती है और सामान्य समझ भी यही बताती है कि इतनी छोटी बच्ची की देखभाल माँ ही बेहतर तरीके से कर सकती है।

    पिता ने तर्क दिया कि पृथक्करण विलेख के अनुसार माँ ने स्वेच्छा से बच्ची की अभिरक्षा उसे सौंप दी थी, इसलिए उसकी अभिरक्षा वैध है और हैबियस कॉर्पस याचिका स्वीकार्य नहीं है। हालांकि अदालत ने पाया कि गवाहों के हलफनामे में केवल इतना कहा गया था कि पिता ने बच्ची की जिम्मेदारी लेने की इच्छा जताई, परंतु यह कहीं नहीं बताया गया कि माँ ने वास्तव में अभिरक्षा सौंपने पर सहमति दी थी या उसकी इच्छा पूछी गई थी। इसलिए अदालत ने इसे माँ की स्वैच्छिक सहमति का प्रमाण मानने से इंकार कर दिया।

    महिला ने यह भी कहा कि 11 जुलाई 2025 की पृथक्करण डीड उससे बलपूर्वक और धोखे से हस्ताक्षर करवाई गई थी, यह कहकर कि बाद में बच्ची उसे वापस मिल जाएगी। अदालत ने दस्तावेज की जांच में कई संदिग्ध पहलू पाए, जैसे फॉन्ट आकार और लाइन स्पेसिंग में अंतर, जिससे पृष्ठों के जोड़ने या बदलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा पति द्वारा प्रस्तुत एक पत्र, जिसमें महिला ने कथित रूप से तलाक स्वीकार किया था, 10 जुलाई 2025 का था, जबकि पृथक्करण विलेख 11 जुलाई 2025 को बनाया गया — जिससे दस्तावेज की विश्वसनीयता और संदिग्ध हो गई।

    अदालत ने यह भी नोट किया कि पिता ने एक ओर पृथक्करण विलेख के आधार पर वैध अभिरक्षा का दावा किया, जबकि दूसरी ओर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक और अभिरक्षा के लिए अलग से याचिका दायर की थी, जो उसके दावे के विपरीत था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य होती है और ऐसे मामलों में सर्वोपरि विचार बच्चे का कल्याण और हित होता है। अदालत ने पाया कि बच्ची लगभग 14 महीनों तक अपनी माँ के साथ रही थी और दोनों के बीच गहरा भावनात्मक संबंध बन चुका था। इतनी छोटी बच्ची को माँ से अलग करना उसके हित में नहीं होगा और इससे उसे मानसिक आघात पहुँच सकता है।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माँ की याचिका स्वीकार करते हुए चार वर्षीय बच्ची की अभिरक्षा माँ को देने का आदेश दिया। साथ ही पिता को सप्ताहांत में मुलाकात (विजिटेशन) का अधिकार दिया गया और यह स्पष्ट किया गया कि वह अभिरक्षा से संबंधित उचित आदेश के लिए परिवार न्यायालय का रुख कर सकता है।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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