प्रथम दृष्टया भारतीय नागरिकता स्थापित: बांग्लादेशी माता-पिता होने के आरोप के बावजूद गुजरात हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दी
Amir Ahmad
5 Jan 2026 3:27 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने उस व्यक्ति को नियमित जमानत प्रदान की, जिस पर बांग्लादेशी माता-पिता होने के बावजूद अवैध रूप से भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करने का आरोप लगाया गया था।
न्यायालय ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी पासपोर्ट के आधार पर आरोपी ने प्रथम दृष्टया अपनी भारतीय नागरिकता स्थापित की है।
जस्टिस निखिल एस. करियल ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध मुख्य आरोप यह है कि वह भारतीय नागरिक नहीं है। हालांकि रिकॉर्ड से यह प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता के पास भारतीय पासपोर्ट है, जिसे जाली नहीं बताया गया। आरोप केवल यह है कि उसके माता-पिता बांग्लादेशी नागरिक हैं।
याचिकाकर्ता ने नियमित जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। उसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 319(2) (छल द्वारा प्रतिरूपण), 336(2) (जालसाजी), 338 (महत्वपूर्ण दस्तावेजों की जालसाजी), 336(3) (छल के उद्देश्य से जालसाजी), 340(2) (जाली दस्तावेज का वास्तविक के रूप में उपयोग) और 54 (अपराध के समय उपस्थित दुष्प्रेरक) के साथ-साथ पासपोर्ट एक्ट की धारा 12(2) के तहत मामला दर्ज किया गया। आरोप-पत्र भी दाखिल किया जा चुका है।
प्रवर्तन एजेंसियों का आरोप था कि याचिकाकर्ता के माता-पिता बांग्लादेशी नागरिक होने के बावजूद उसने भारत में जन्म दर्शाने वाला जन्म प्रमाणपत्र प्राप्त किया, जिसमें जन्म स्थान कल्याणी नगरपालिका दर्शाया गया।
हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान में ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं, जिनके आधार पर याचिकाकर्ता ने प्रथम दृष्टया स्वयं को भारतीय नागरिक सिद्ध किया और सक्षम प्राधिकारी से पासपोर्ट प्राप्त किया।
न्यायालय ने यह भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता 27 मई 2025 से न्यायिक हिरासत में है और उसका पासपोर्ट पहले ही पुलिस द्वारा जब्त किया जा चुका है।
न्यायालय ने कहा कि इन परिस्थितियों में याचिकाकर्ता को आगे हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है। आरोपों की प्रकृति और मामले के तथ्यों को देखते हुए साक्ष्यों पर विस्तार से चर्चा किए बिना यह जमानत दिए जाने का उपयुक्त मामला है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को 10,000 रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के एक जमानती के साथ नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया, जो ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अधीन होगा।
साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जमानत आदेश में की गई टिप्पणियां केवल प्रारंभिक प्रकृति की हैं और ट्रायल कोर्ट मुकदमे के दौरान इनसे प्रभावित नहीं होगा।

