Adani Defamation Case: गुजरात हाईकोर्ट ने पत्रकार रवि नायर की अतिरिक्त सबूत पेश करने की याचिका खारिज की

  • Adani Defamation Case: गुजरात हाईकोर्ट ने पत्रकार रवि नायर की अतिरिक्त सबूत पेश करने की याचिका खारिज की

    गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार (2 नवंबर) को पत्रकार रवि नायर की वह याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने सेशंस कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। सेशंस कोर्ट ने मानहानि के एक मामले में, जो अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) द्वारा दायर किया गया, नायर की अतिरिक्त सबूत पेश करने की अर्जी ठुकरा दी थी।

    अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि रवि नायर ने कई ट्वीट किए और उन्हें फैलाया, जिनमें झूठे और मानहानिपूर्ण बयान थे। इनका मकसद AEL और अडानी ग्रुप की साख को नुकसान पहुंचाना था।

    10 फरवरी 2016 को मानसा के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास ने नायर को मानहानि का दोषी ठहराया। उन्हें एक साल की साधारण कैद की सजा सुनाई गई और 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।

    इस फैसले से असंतुष्ट होकर नायर ने सेशंस कोर्ट में अपील दायर की। इसके बाद उन्होंने सेशंस कोर्ट में एक अर्जी देकर अपील के दौरान अतिरिक्त सबूत पेश करने की अनुमति मांगी, जिसे 22 जुलाई को सेशंस कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

    जस्टिस आर.टी. वछानी ने अपने आदेश में CrPC की धारा 391 का जिक्र करते हुए कहा कि यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि किसी पक्ष को अतिरिक्त सबूत पेश करने की अनुमति तभी दी जा सकती है, जब कोर्ट याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए तर्कों से संतुष्ट हो।

    याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि पूरी सावधानी बरतने और ईमानदारी से कोशिश करने के बावजूद, वह इन दस्तावेजों को पहले पेश नहीं कर सका। साथ ही ये दस्तावेज मामले की जड़ से जुड़े होने चाहिए, और इनके न होने से याचिकाकर्ता को भारी नुकसान हो सकता है।

    हालांकि, कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता के वकील ने भी यह मान लिया था—और अपीलीय अदालत के आदेश से भी यही पता चलता है—कि जिन दस्तावेजों को याचिकाकर्ता पेश करना चाहता था, वे पहले से ही रिकॉर्ड का हिस्सा थे।

    इसमें कहा गया:

    "उपर्युक्त प्रावधान को ध्यान में रखते हुए, और याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील की सहमति को देखते हुए, साथ ही पहली अपीलीय अदालत के निष्कर्ष से भी यह स्पष्ट होता है कि जिन दस्तावेजों को पेश करने की मांग की जा रही है, वे पहले से ही रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। इसलिए CrPC की धारा 391 के प्रावधान को लागू नहीं किया जा सकता।

    इसलिए याचिकाकर्ता के वकील द्वारा उठाए गए अन्य पहलुओं पर विस्तार से चर्चा किए बिना, और केवल अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने के मुद्दे तक सीमित रहते हुए (जैसा कि पिछले पैराग्राफ में बताया गया), ऐसी स्थिति कभी उत्पन्न ही नहीं होगी, जहां अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में उन दस्तावेजों को पेश करने की आवश्यकता पड़े, जो पहले से ही रिकॉर्ड का हिस्सा हैं।"

    अदालत ने गौर किया कि हालांकि नायर के वकील ने साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 3 पर जोर दिया था, लेकिन अदालत का मानना ​​है कि यह प्रावधान साक्ष्यों के मूल्यांकन से संबंधित है और इसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। यहां मुख्य मुद्दा केवल यह है कि क्या CrPC की धारा 391 के तहत अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की मांग को स्वीकार किया जाना चाहिए या नहीं।

    अदालत ने कहा,

    "इसलिए यह दलील विश्वसनीय नहीं लगती और इस चरण में इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। उपर्युक्त कारणों से यह पुनरीक्षण याचिका (Revision Application) आधारहीन है और इसे खारिज किया जाता है।"

    हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में दिए गए तर्क केवल इसी मुद्दे तक सीमित हैं। इससे दोनों पक्षों को पहली अपीलीय अदालत के समक्ष इस मुद्दे को उठाने से नहीं रोका जाएगा। पहली अपीलीय अदालत कानून के अनुसार इस मामले पर विचार करेगी। इस याचिका के खारिज होने का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    नायर ने तर्क दिया था कि ट्रायल के दौरान, शिकायतकर्ता ने खुद कुछ ट्वीट पेश किए थे। हर ट्वीट के साथ एक "न्यूज लिंक" भी था, जो उस थर्ड-पार्टी न्यूज रिपोर्ट की ओर इशारा करता था जिसका जिक्र ट्वीट में किया गया। इसके अलावा, उन्होंने दो लेखों को पूरी तरह से 'एग्जिबिट 61' और 'एग्जिबिट 62' के रूप में पेश किया। आवेदक का दावा है कि वह अब जो सामग्री पेश करना चाहता है, वह कोई नया साक्ष्य नहीं है।

    उन्होंने दावा किया कि यह सामग्री उन थर्ड-पार्टी न्यूज रिपोर्टों का पूरा टेक्स्ट है, जिनकी पहचान शिकायतकर्ता के अपने 'एग्जिबिट 46 से 60' में पहले ही की जा चुकी है। उन्होंने कहा था कि मानहानि के मामले में 'सच्चाई' और 'जनहित' बचाव के पूर्ण आधार हैं। अदालत उन आरोपों की सच्चाई या याचिकाकर्ता की नेक नीयत की जांच तब तक नहीं कर सकती, जब तक कि वह उन स्रोतों की पड़ताल न करे, जिन पर याचिकाकर्ता ने भरोसा किया।

    इस बीच अडानी एंटरप्राइजेज ने दावा किया कि ये दस्तावेज बहुत देर से पेश किए गए। याचिकाकर्ता के पास मजिस्ट्रेट कोर्ट में अभियोजन पक्ष के गवाहों से पूछताछ और जिरह करने के दौरान, तथा दस्तावेजी सबूतों के मूल्यांकन के समय, इन दस्तावेजों को पेश करने का पूरा मौका था।

    यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता के पास ये दस्तावेज मौजूद थे और उसे इनके बारे में पता भी था, फिर भी उसने इनका कोई जिक्र नहीं किया। मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के आदेश के बाद, और जब इस आदेश को पहली अपीलीय अदालत में चुनौती दी गई, तब जाकर याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने की अर्जी खारिज करने वाले आदेश को चुनौती देने की कोशिश की।

    Case Title : RAVI NAIR v/s STATE OF GUJARAT & ANR

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