नियोक्ता की स्वीकारोक्ति को नजरअंदाज करना गंभीर त्रुटि: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने मृत चालक के परिवार का मुआवजा बढ़ाया

Amir Ahmad

22 July 2026 12:55 PM IST

  • नियोक्ता की स्वीकारोक्ति को नजरअंदाज करना गंभीर त्रुटि: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने मृत चालक के परिवार का मुआवजा बढ़ाया

    गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत मृत चालक के परिजनों को मिलने वाली क्षतिपूर्ति राशि बढ़ाते हुए कहा कि आयुक्त ने चालक के वेतन के संबंध में नियोक्ता की स्पष्ट स्वीकारोक्ति को नजरअंदाज कर गंभीर त्रुटि की।

    जस्टिस मृदुल कुमार कलिता ने अपील स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि 5,81,280 रुपये से बढ़ाकर 8,43,680 रुपये की। साथ ही इस राशि पर आयुक्त के आदेश के एक महीने बाद से भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी निर्देश दिया।

    मामला कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त, बारपेटा के 8 अक्टूबर 2020 के आदेश के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा था। हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या आयुक्त ने उपलब्ध साक्ष्यों के बावजूद मृत चालक का मासिक वेतन 5,500 रुपये तय करके कानून के अनुरूप कार्य किया।

    मृतक हराज अली प्रतिवादी के वाहन पर चालक के रूप में कार्यरत था। 23 जून 2013 को ड्यूटी के दौरान वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें गंभीर रूप से घायल होने के बाद उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उसके परिजनों ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग की।

    सुनवाई के दौरान वाहन मालिक ने अपने लिखित जवाब में स्वीकार किया था कि हराज अली उसके यहां चालक था और उसे 8,000 रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता था। वहीं, दावा करने वालों ने 12,000 रुपये मासिक वेतन का वेतन प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किया।

    इसके बावजूद आयुक्त ने यह कहते हुए कि वेतन का कोई प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया है मृतक की मासिक आय 5,500 रुपये मान ली।

    हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद कहा कि यह निष्कर्ष पूरी तरह तथ्यात्मक त्रुटि पर आधारित है।

    कोर्ट ने कहा,

    "आयुक्त का यह कहना कि दावा करने वालों ने वेतन प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया, जबकि रिकॉर्ड पर ऐसा दस्तावेज मौजूद था, प्रासंगिक साक्ष्यों की अनदेखी कर दिया गया निष्कर्ष है, जो स्पष्ट रूप से विकृत है।"

    कोर्ट ने माना कि भले ही वेतन प्रमाणपत्र को इसलिए स्वीकार न किया जाए क्योंकि उसे जारी करने वाला मालिक गवाह के रूप में पेश नहीं हुआ लेकिन उसके लिखित जवाब में 8,000 रुपये मासिक वेतन दिए जाने की स्पष्ट स्वीकारोक्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    "यह स्थापित विधिक सिद्धांत है कि जिन तथ्यों को स्वीकार कर लिया गया हो उन्हें अलग से सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए आयुक्त को यह मानना चाहिए कि मृतक को 8,000 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि वेतन संबंधी कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं होता तो आयुक्त असम सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के आधार पर आय तय कर सकते थे। लेकिन जब नियोक्ता स्वयं वेतन स्वीकार कर चुका था तब उसकी अनदेखी करना उचित नहीं था।

    इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने मृतक की मासिक आय 8,000 रुपये मानते हुए क्षतिपूर्ति की नई गणना की और ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को चार सप्ताह के भीतर संशोधित राशि तथा 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया।

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