भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कार्यवाही नहीं चल सकती : गुवाहाटी हाइकोर्ट
Amir Ahmad
21 Jan 2026 2:03 PM IST

गुवाहाटी हाइकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत किसी आरोपी के खिलाफ कार्यवाही तब तक कायम नहीं रह सकती, जब तक रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री ठोस न हो और उसका सीधा संबंध आरोपी के आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से स्थापित न होता हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सुनी-सुनाई बातों (हियरसे) के आधार पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानूनन उचित नहीं है।
जस्टिस संजीव कुमार शर्मा की एकल पीठ ने यह टिप्पणी एक होमगार्ड कर्मी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें विशेष अदालत में लंबित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही को चुनौती दी गई।
मामला
यह मामला वर्ष 2018 की एक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों ने खुद को होमगार्ड एसोसिएशन का पदाधिकारी बताकर “कॉलआउट और भर्ती” के नाम पर होमगार्ड स्वयंसेवकों से पैसे वसूले। इस शिकायत के आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं 7 और 13 के तहत मामला दर्ज किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता नंबर 2 और 3 असम होमगार्ड अधिनियम और नियम, 1947 के अंतर्गत कार्यरत होमगार्ड हैं। उन्हें केवल उसी समय लोक सेवक माना जा सकता है, जब वे अधिनियम के तहत अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हों। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता नंबर 2 का नाम न तो FIR में था और न ही जांच के दौरान उसके खिलाफ ऐसा कोई ठोस आरोप सामने आया, जिसका संबंध उसके आधिकारिक कर्तव्यों से हो।
हाइकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता नंबर 2 के खिलाफ ऐसा कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं है, जो उसके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ा हो। अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ उपलब्ध सामग्री केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है और इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उसने लोक सेवक के रूप में कोई आपराधिक कृत्य किया।
जस्टिस संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि ऐसे हालात में याचिकाकर्ता नंबर 2 के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं है।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता नंबर 1 और 3 के मामले में स्थिति अलग है। अदालत ने नोट किया कि दो गवाहों के बयान उपलब्ध हैं, जिनमें कहा गया कि याचिकाकर्ता नंबर 1 ने उपयुक्त पोस्टिंग दिलाने के नाम पर रिश्वत मांगी और स्वीकार की। इसके अलावा, रिश्वत लेते हुए उसका वीडियो फुटेज भी रिकॉर्ड पर मौजूद है।
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अनुसार अपराध से जुड़े तथ्य मौखिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के माध्यम से भी साबित किए जा सकते हैं। ऐसे में याचिकाकर्ता नंबर 1 और 3 के खिलाफ यह नहीं कहा जा सकता कि मामला बिना किसी साक्ष्य के है।
इन तथ्यों के आधार पर गुवाहाटी हाइकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता नंबर 2 के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। वहीं, याचिकाकर्ता नंबर 1 और 3 के खिलाफ कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से अदालत ने इनकार कर दिया।

