आय से अधिक संपत्ति मामले में जांच के लिए धारा 17ए की पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट

Amir Ahmad

23 July 2026 12:40 PM IST

  • आय से अधिक संपत्ति मामले में जांच के लिए धारा 17ए की पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट

    गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपों की जांच शुरू करने से पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए के तहत सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी आवश्यक नहीं है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह के आरोप किसी लोकसेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान दी गई सिफारिश या लिए गए निर्णय से संबंधित नहीं होते।

    जस्टिस मृदुल कुमार कलिता ने पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के रिटायर डिप्टी चीफ इंजीनियर रंजीत दास की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

    रंजीत दास ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत याचिका दायर कर उनके खिलाफ दर्ज FIR, अभियोजन स्वीकृति, आरोपपत्र और लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    "याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने का है। यह आरोप उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किसी विशेष सिफारिश या निर्णय से संबंधित नहीं है। इसलिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत जांच शुरू करने से पहले पूर्व मंजूरी लेने का प्रश्न ही नहीं उठता।"

    मामले के अनुसार, एक जनवरी 2013 से 31 दिसंबर 2019 के बीच की जांच अवधि में रंजीत दास के पास उनकी ज्ञात आय के स्रोतों की तुलना में 47 लाख 92 हजार 977 रुपये की आय से अधिक संपत्ति होने का आरोप लगाया गया।

    यह उनकी ज्ञात आय का 47.53 प्रतिशत बताया गया। जांच के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने आरोपपत्र दाखिल किया, जिसके आधार पर विशेष अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए।

    हाईकोर्ट में रंजीत दास ने तर्क दिया कि धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी लिए बिना जांच शुरू की गई, इसलिए पूरी कार्रवाई अवैध है। उन्होंने धारा 19 के तहत दी गई अभियोजन स्वीकृति की वैधता पर भी सवाल उठाया और सीबीआई द्वारा आय एवं व्यय के आकलन पर आपत्ति जताई। साथ ही FIR और आरोपपत्र में आय से अधिक संपत्ति के प्रतिशत में अंतर होने का भी मुद्दा उठाया।

    हालांकि हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को स्वीकार करने से इनकार किया।

    अदालत ने कहा कि धारा 17ए केवल उन मामलों में लागू होती है, जहां कथित अपराध किसी लोकसेवक द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों के दौरान लिए गए निर्णय या की गई सिफारिश से जुड़ा हो। आय से अधिक संपत्ति का मामला इस दायरे में नहीं आता।

    अभियोजन स्वीकृति को चुनौती देने के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी ने उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद 20 अक्टूबर 2023 को स्वीकृति प्रदान की थी। यदि याचिकाकर्ता का आरोप है कि स्वीकृति देते समय उचित विचार नहीं किया गया तो इस मुद्दे की जांच विचारण अदालत में हो सकती है। धारा 528 के तहत कार्यवाही में इस पर विचार करना मिनी ट्रायल करने के समान होगा।

    अदालत ने यह भी कहा कि आय, व्यय, पत्नी की आय तथा FIR और आरोपपत्र के बीच कथित विसंगतियों जैसे मुद्दों पर इस स्तर पर साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इन सभी तथ्यों की जांच और निर्णय का अधिकार विचारण अदालत का है।

    हाईकोर्ट ने अंत में कहा कि इस मामले में ऐसा कोई असाधारण आधार नहीं है, जिसके चलते उसकी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर आपराधिक कार्यवाही रद्द की जाए। इसलिए याचिका खारिज की गई।

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