मूल ध्वस्तीकरण आदेश को चुनौती दिए बिना बाद के आदेश पर राहत नहीं मिल सकती: गुवाहाटी हाईकोर्ट
Amir Ahmad
3 July 2026 1:44 PM IST

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी निर्माण को गिराने का मूल आदेश चुनौती नहीं दिया गया है तो उसके आधार पर जारी किए गए बाद के ध्वस्तीकरण कार्यक्रम या कार्रवाई संबंधी आदेश को अलग से चुनौती देकर राहत नहीं मांगी जा सकती।
जस्टिस मनीष चौधरी ने गुवाहाटी महानगर विकास प्राधिकरण (GMDA) द्वारा कथित अवैध निर्माण हटाने के लिए जारी ध्वस्तीकरण कार्यक्रम में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि विवादित आदेश केवल पहले से पारित ध्वस्तीकरण आदेश का परिणाम है।
अदालत ने कहा,
"18 जून 2026 का विवादित आदेश 19 नवंबर 2025 के मूल आदेश के परिणामस्वरूप जारी किया गया। चूंकि 19 नवंबर 2025 के मूल आदेश को इस याचिका में चुनौती नहीं दी गई, इसलिए केवल उसके आधार पर जारी बाद के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।"
मामले में याचिकाकर्ताओं ने धारापुर, गुवाहाटी स्थित ईंट की चारदीवारी और मकान को हटाने के लिए समय और तारीख तय करने वाले GMDA के आदेश को चुनौती दी थी।
यह आदेश GMDA Act, 1985 की धारा 88 के तहत पारित पहले के ध्वस्तीकरण आदेश के अनुपालन में जारी किया गया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि पहले याचिकाकर्ताओं को कथित अवैध निर्माण रोकने और यह बताने के लिए नोटिस जारी किया गया कि निर्माण क्यों न गिराया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने अपना जवाब भी दाखिल किया था। इसके बाद सुनवाई के लिए नोटिस जारी किए गए और सभी पक्षों को सुनने के बाद ही ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया गया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि GMDA Act के तहत अपील का वैधानिक प्रावधान उपलब्ध है और वे उस उपाय का लाभ उठाना चाहते हैं।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास मूल ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ अपील दायर करने का प्रभावी वैधानिक उपाय मौजूद है।
अदालत ने यह भी कहा कि भले ही अपील की निर्धारित समय-सीमा समाप्त हो चुकी हो, लेकिन अपीलीय प्राधिकारी के पास देरी माफ करने का अधिकार है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को एक महीने के भीतर अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील दायर करने की स्वतंत्रता दी।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि अपील के साथ देरी माफ करने का आवेदन दाखिल किया जाता है तो अपीलीय प्राधिकारी सभी प्रासंगिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उस पर कानून के अनुसार निर्णय ले।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियां केवल रिट याचिका की ग्राह्यता के प्रश्न तक सीमित हैं और इन्हें मामले के गुण-दोष पर किसी राय के रूप में नहीं माना जाएगा। अपीलीय प्राधिकारी अपील पर स्वतंत्र रूप से और कानून के अनुसार फैसला करेगा।


