नागरिकता साबित करने के लिए NRC अंश स्वीकार्य साक्ष्य नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट

Amir Ahmad

12 May 2026 1:19 PM IST

  • नागरिकता साबित करने के लिए NRC अंश स्वीकार्य साक्ष्य नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट

    गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के अंशों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ ने कहा कि हाल ही में दिए गए एक फैसले में भी अदालत यह स्पष्ट कर चुकी है कि नागरिकता तय करने के मामलों में NRC दस्तावेजों का कानूनी महत्व नहीं है।

    अदालत ने कहा,

    “याचिकाकर्ता ने NRC विवरण पर भरोसा किया जिसमें उसे अबुल हाकी का पुत्र बताया गया था। लेकिन यह दस्तावेज साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है। हाल के फैसले में अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि ऐसे मामलों में NRC दस्तावेज की कानून की नजर में कोई वैधता नहीं है।”

    यह फैसला जीवन अली नामक व्यक्ति की याचिका पर आया, जिसने विदेशी न्यायाधिकरण, कामरूप के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे 25 मार्च 1971 के बाद भारत आया विदेशी घोषित किया गया।

    मामले के अनुसार जीवन अली ने दावा किया कि उसके कथित दादा हकीमुद्दीन शेख को वर्ष 1942 में वार्षिक खिराज पट्टा मिला था। असम में खिराज पट्टा स्थायी और हस्तांतरणीय भूमि अधिकार दस्तावेज माना जाता है।

    उसने यह भी कहा कि उसके पिता का नाम NRC में दर्ज था और उसका जन्म वर्ष 1956 में हुआ था। बाद में ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव के कारण उसे अपना निवास स्थान बदलना पड़ा। उसने 1977, 1985, 1997 और 2005 की मतदाता सूचियों तथा गांवबुड़ा प्रमाणपत्र का सहारा लिया।

    विदेशी न्यायाधिकरण ने उसे विदेशी घोषित करते हुए कहा था कि यदि 1977 की मतदाता सूची में उसकी आयु सही मानी जाए तो उसका नाम 1971 से पहले की मतदाता सूची में भी होना चाहिए था।

    न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि वह अपने कथित दादा से संबंध साबित नहीं कर सका और गांवबुड़ा प्रमाणपत्र में भी यह नहीं बताया गया कि प्रमाणपत्र जारी करने वाले को उसकी भारतीय नागरिकता की जानकारी कैसे थी।

    हाईकोर्ट ने पाया कि जिस खिराज पट्टा पर याचिकाकर्ता ने भरोसा किया उसके समर्थन में कोई राजस्व रसीद या ऐसा दस्तावेज पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि दादा की मृत्यु के बाद भी वह अधिकार उत्तराधिकारियों के पास जारी रहा।

    अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह कहीं नहीं बताया कि दादा की मृत्यु के बाद उस खिराज पट्टा का क्या हुआ।

    मतदाता सूचियों के संबंध में अदालत ने कहा कि बाद की सूचियों में नाम होने के बावजूद 25 मार्च 1971 से पहले का ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया, जिससे पिता या दादा से संबंध साबित हो सके।

    गांवबुड़ा प्रमाणपत्र पर भी अदालत ने सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि प्रमाणपत्र में यह नहीं लिखा गया कि गांवबुड़ा याचिकाकर्ता या उसके परिवार को व्यक्तिगत रूप से जानते थे। केवल नाम और पता लिख देना नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि विदेशी न्यायाधिकरण ने उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों का सही मूल्यांकन कर फैसला दिया।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी अधिकारिता पर्यवेक्षणात्मक है अपीलीय नहीं, इसलिए तथ्यों के निष्कर्षों की दोबारा समीक्षा नहीं की जा सकती।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका निराधार मानते हुए खारिज की।

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