UAPA मामले की गंभीरता से PMLA में लंबी हिरासत जायज नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट, अनुच्छेद 21 सर्वोपरि
Amir Ahmad
25 Sept 2026 12:50 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि UAPA के तहत दर्ज मूल मामले में आरोपों की गंभीरता, अपने आपमें धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के अलग मामले में किसी आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखने का आधार नहीं बन सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि PMLA में हिरासत की अवधि पर गंभीरता ही पूरा जवाब नहीं हो सकती और संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा त्वरित सुनवाई की गारंटी देता है।
जस्टिस संजीव नरूला ने कथित नागा उग्रवादी मसासासोंग आओ को PMLA मामले में जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। आरोपी अक्टूबर 2022 से हिरासत में था और मामले में करीब चार साल से जेल में था। यह मामला UAPA के तहत दर्ज उस मूल मामले से जुड़ा था, जिसमें जबरन वसूली और आतंकी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के आरोप लगाए गए।
हाईकोर्ट ने कहा कि UAPA और PMLA के तहत चल रही दोनों कार्यवाहियां अलग-अलग हैं और अदालत के सामने फिलहाल PMLA के तहत अधिकतम सात साल की सजा का प्रावधान है। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों की प्रकृति के कारण अनुच्छेद 21 के संरक्षण को खत्म नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि PMLA की धारा 45 में जमानत के लिए कड़े प्रावधान होने के बावजूद इसका इस्तेमाल अनिश्चितकाल तक विचाराधीन हिरासत जारी रखने के लिए नहीं किया जा सकता। यदि आरोपी लंबे समय से जेल में है और मुकदमे के उचित समय में पूरा होने की संभावना नहीं है तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी को ध्यान में रखते हुए जमानत पर विचार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा,
“प्री-ट्रायल हिरासत को दंडात्मक स्वरूप लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती, अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था का मूल आधार बना रहता है।”
अदालत ने यह भी कहा कि जमानत के स्तर पर अदालत को साक्ष्यों की बारीकी से जांच कर आरोपी की अंतिम निर्दोषता पर फैसला नहीं देना होता। धारा 45 के तहत अदालत को व्यापक तौर पर यह देखना होता है कि आरोपी के अपराध में शामिल नहीं होने के विश्वास के लिए उचित आधार हैं या नहीं और जमानत पर रिहा होने के बाद उसके दोबारा अपराध करने की आशंका है या नहीं।
मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने आरोपी के बैंक खातों से कथित तौर पर हुए कई लेनदेन, जमा और निकासी तथा सह-आरोपी अलेमला जमीर की गिरफ्तारी के बाद हुए कुछ लेनदेन पर भरोसा किया। अभियोजन ने एक बयान का भी हवाला दिया था, जिसमें आरोप था कि आरोपी ने धन हस्तांतरण के निर्देश दिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आरोपी के नाम वाले बैंक अकाउंट से कथित तौर पर संदिग्ध धन के गुजरने से ही PMLA की धारा 3 के तहत धनशोधन का अपराध स्थापित नहीं हो जाता। अभियोजन को यह साबित करना होगा कि आरोपी सीधे या परोक्ष रूप से अपराध से प्राप्त आय से जुड़ी किसी प्रक्रिया या गतिविधि में शामिल था।
अदालत ने माना कि उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया अभियोजन के मामले पर विचार की जरूरत दिखाती है, लेकिन आरोपी का यह दावा कि खातों का वास्तविक संचालन और नियंत्रण काफी हद तक सह-आरोपी जमीर के पास था जमानत के चरण में महज इनकार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह तय करना कि इन परिस्थितियों से आरोपी को धन के आपराधिक स्रोत की जानकारी थी और उसने जानबूझकर उसके धनशोधन में भाग लिया, केवल धन के लेनदेन से स्वतः साबित नहीं होता। इसका फैसला मुकदमे में साक्ष्यों की जांच के बाद ही किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी 18 अक्टूबर 2022 से हिरासत में था। PMLA की धारा 4 के तहत अधिकतम सात साल की सजा के मुकाबले उसने 18 अप्रैल को अधिकतम सजा की आधी अवधि पूरी की थी। 23 जुलाई तक उसकी हिरासत तीन साल, नौ महीने और छह दिन हो चुकी थी।
अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 436ए के तहत अधिकतम सजा की आधी अवधि पूरी होने मात्र से जमानत का पूर्ण अधिकार पैदा नहीं होता। फिर भी यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार पर आधारित है और तब विशेष महत्व रखता है, जब आरोपी आधी अधिकतम सजा के बराबर अवधि जेल में काट चुका हो तथा मुकदमा अभी लंबित हो।
मामले में अभियोजन ने 27 गवाहों को पेश करने की बात कही थी, लेकिन जुलाई तक केवल पांच गवाहों की गवाही हो सकी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है, जिससे यह लगे कि मुकदमा जल्द पूरा होने वाला है। अदालत ने यह भी पाया कि मुकदमे में देरी के लिए आरोपी को जिम्मेदार ठहराने वाला कोई आधार नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है, संबंधित वित्तीय रिकॉर्ड सुरक्षित हैं और ऐसा कोई आधार सामने नहीं आया, जिससे यह माना जाए कि आरोपी जमानत पर रहते हुए दोबारा अपराध करेगा या मुकदमे की प्रक्रिया प्रभावित होगी।
अदालत ने अंततः कहा,
“मुकदमे के अनिश्चित अंत तक आरोपी को हिरासत में रखना प्री-ट्रायल हिरासत को दंडात्मक स्वरूप देगा। धारा 45 ऐसा परिणाम आवश्यक नहीं करती और अनुच्छेद 21 इसकी अनुमति नहीं देता।”
इसके साथ ही दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दी।

