एशियन पैरा गेम्स: खिलाड़ियों के चयन में मनमानी न हो तो कोर्ट तय टीम में बदलाव का आदेश नहीं दे सकता- दिल्ली हाईकोर्ट

  • एशियन पैरा गेम्स: खिलाड़ियों के चयन में मनमानी न हो तो कोर्ट तय टीम में बदलाव का आदेश नहीं दे सकता- दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों के चयन और अंतिम रूप से तय किए गए दल में अदालत आमतौर पर दखल नहीं दे सकती। जब तक चयन प्रक्रिया में मनमानी या निर्णय में स्पष्ट मनमानी नजर न आए तब तक अदालत अधिकारियों को टीम में बदलाव करने का निर्देश नहीं दे सकती।

    जस्टिस अमित महाजन ने यह टिप्पणी भारत की ओर से एशियन पैरा गेम्स में हिस्सा लेने के लिए चयनित नहीं किए गए पांच पैरा-साइकिलिस्टों की याचिका खारिज करते हुए की।

    याचिकाकर्ताओं ने 18 से 24 अक्टूबर तक होने वाले पांचवें एशियन पैरा गेम्स, आइची-नागोया 2026 के लिए भारतीय दल में शामिल नहीं किए जाने को चुनौती दी थी। उन्होंने 1 अक्टूबर के उस मंजूरी आदेश रद्द करने की मांग की, जिसके तहत केवल पैरा-साइकिलिस्ट अरशद शेख की भागीदारी को मंजूरी दी गई। खिलाड़ियों ने यह भी आग्रह किया कि यदि भारतीय दल में जगह खाली हैं, तो उन्हें अपने खर्च पर प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की अनुमति दी जाए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अदालत अधिकारियों को अंतिम रूप से तय किए गए दल में बदलाव करने या पात्रता के बारे में अलग राय अपनाने का निर्देश नहीं दे सकती, जब तक अधिकारियों का फैसला मनमाना न हो।

    जस्टिस महाजन ने कहा कि किसी खिलाड़ी को किसी विशेष श्रेणी में शामिल करना या बाहर रखना संबंधित अधिकारियों और विषय विशेषज्ञों का काम है। वे खिलाड़ियों को प्रतियोगिता में भेजने की व्यावहारिक संभावनाओं और निर्धारित मानकों को ध्यान में रखकर निर्णय लेते हैं।

    याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि 16 जुलाई को चयन समिति ने सर्वसम्मति से उन्हें एशियन पैरा गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना है।

    उनका कहना है कि वे पात्रता की सभी शर्तें पूरी करते हैं और कम से कम एक स्पर्धा में एशिया के शीर्ष देशों के खिलाड़ियों में शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दल में खाली स्थान होने के बावजूद उन्हें बाहर रखना उचित नहीं है।

    केंद्र सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि खिलाड़ी युवा मामले और खेल मंत्रालय के 24 सितंबर 2025 के परिपत्र में तय प्रदर्शन मानकों को पूरा नहीं करते थे।

    सरकार की ओर से बताया गया कि पैरा-साइकिलिंग ऐसे खेलों की श्रेणी में आती है, जहां प्रदर्शन को मापा जा सकता है। इसलिए चयन केवल रैंकिंग के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित प्रदर्शन मानकों के अनुसार किया जाता है।

    हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारियों ने खिलाड़ियों के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए एशियाई चैंपियनशिप और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के नतीजों पर विचार किया। इसके बाद ही यह तय किया गया कि कौन-से खिलाड़ी निर्धारित मानकों पर खरे उतरते हैं।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खिलाड़ियों के लिए उपलब्ध कोटे में खाली जगह होने से उन्हें प्रतियोगिता में भाग लेने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। कोटे की संख्या केवल अधिकतम प्रवेश की सीमा बताती है और इससे किसी खिलाड़ी की पात्रता की कमी दूर नहीं हो जाती।

    अपने खर्च पर प्रतियोगिता में भाग लेने की मांग भी कोर्ट ने स्वीकार नहीं की।

    अदालत ने कहा कि यह मांग खेल मंत्रालय के परिपत्र की धारा 12 के विपरीत है। इस प्रावधान के अनुसार, भारतीय दल में केवल उन्हीं खिलाड़ियों को शामिल किया जा सकता है, जिनकी भागीदारी को सरकारी खर्च पर मंजूरी दी गई हो।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वह खिलाड़ियों के पदक जीतने की संभावनाओं को लेकर विशेषज्ञों के आकलन की जगह अपना आकलन नहीं रख सकता और न ही विशेषज्ञों द्वारा तय मानकों को कमजोर कर सकता है।

    अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारतीय दल को पहले ही अंतिम रूप दिया जा चुका है और उसके आधार पर आगे की प्रक्रिया भी पूरी की जा चुकी है। इस स्तर पर बदलाव के लिए कई प्रशासनिक मंजूरियों की जरूरत पड़ेगी।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं मिला और पांचों पैरा-साइकिलिस्टों की याचिका खारिज की गई।

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