करदाताओं द्वारा छिपाए जाने के विशिष्ट तथ्य को इंगित किए बिना विभाग केवल गलत बयान का आरोप लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

  • करदाताओं द्वारा छिपाए जाने के विशिष्ट तथ्य को इंगित किए बिना विभाग केवल गलत बयान का आरोप लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    यह पाते हुए कि याचिकाकर्ता को जारी कारण बताओ नोटिस ने अपने GST पंजीकरण को रद्द करने के लिए कोई समझदार कारण निर्धारित नहीं किया है, दिल्ली हाईकोर्ट ने उक्त कारण को रद्द कर दिया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस में GST अधिनियम, 2017 की धारा 29 (2) (e) के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, जो किसी भी विशिष्ट तथ्य को इंगित किए बिना, धोखाधड़ी के माध्यम से प्राप्त होने पर करदाता के GST पंजीकरण को रद्द करने के लिए सक्षम अधिकारी को अधिकृत करता है।

    जस्टिस विभु बाखरू और जस्टिस सचिन दत्ता की खंडपीठ ने कहा कि "आक्षेपित एससीएन ने किसी भी कथित धोखाधड़ी का संकेत नहीं दिया या किसी भी बयान का उल्लेख नहीं किया, जो कथित तौर पर एक जानबूझकर गलत बयान है। इसने ऐसे किसी तथ्य को भी निर्धारित नहीं किया, जिसे याचिकाकर्ता द्वारा कथित रूप से दबाया गया है।

    पूरा मामला:

    याचिकाकर्ता से यह बताने के लिए कहा गया था कि उसका GST पंजीकरण रद्द क्यों न कर दिया जाए। जवाब में, याचिकाकर्ता ने रद्द करने के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया। उक्त आवेदन के अनुसरण में, प्रतिवादी/विभाग ने एक कारण बताओ नोटिस जारी किया जिसमें याचिकाकर्ता से कारण बताने के लिए कहा गया कि रद्दीकरण आदेश को रद्द करने के लिए उसके आवेदन को खारिज क्यों नहीं किया जाए। चूंकि याचिकाकर्ता ने न तो एससीएन का जवाब दिया और न ही नियत तारीख और समय पर संबंधित उचित अधिकारी के समक्ष पेश हुआ, इसलिए रद्द करने के आदेश को रद्द करने के लिए याचिकाकर्ता के आवेदन को खारिज कर दिया गया। इसलिए, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    हाईकोर्ट का निर्णय:

    सबसे पहले, बेंच ने कहा कि रद्द करने का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए पारित किया गया था।

    इसके अलावा, बेंच ने देखा कि रद्द करने के आदेश को रद्द करने के लिए याचिकाकर्ता के आवेदन के अनुसार पारित किया गया एससीएन, स्पष्ट रूप से उक्त आवेदन को अस्वीकार करने और रद्द करने के आदेश को बनाए रखने के लिए दो कारण निर्धारित करता है।

    निरसन आवेदन को अस्वीकार करने का पहला कारण यह था कि याचिकाकर्ता का अपने व्यवसाय के मुख्य स्थान का पता अस्पष्ट था और इसका पता नहीं लगाया जा सकता था।

    दूसरी ओर, पीठ ने कहा कि निरस्तीकरण आवेदन को अस्वीकार करने का दूसरा कारण यह था कि याचिकाकर्ता ने दो महीने की अवधि के भीतर भारी कारोबार दिखाया था और इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का लाभ उठाकर पूरे GST का भुगतान किया गया था।

    पीठ ने कहा कि जब सक्षम अधिकारी ने उक्त लेनदेन की वास्तविकता पर सवाल उठाया और याचिकाकर्ता को इसका विवरण प्रस्तुत करने के लिए कहा, तो याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका को उक्त आरोपों का जवाब देने का अवसर मांगने तक सीमित कर दिया।

    इसलिए, हाईकोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके द्वारा रद्द करने के आदेश को रद्द करने के लिए याचिकाकर्ता के आवेदन को खारिज कर दिया गया था, क्योंकि यह प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है, ताकि याचिकाकर्ता को एससीएन में आरोपों का जवाब देने में सक्षम बनाया जा सके।

    इस प्रकार, हाईकोर्ट ने निर्धारिती के पक्ष में कानून के सवाल का जवाब देकर मामले का निपटारा किया।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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